उत्तराखंड की गोद में बसा एक शांत, सुंदर और ऐतिहासिक शहर — टिहरी। कभी यह गढ़वाल रियासत की राजधानी हुआ करता था, जहाँ.........................
पुरानी टिहरी का डूबना – एक शहर जो पानी में समा गया
उत्तराखंड की गोद में बसा एक शांत, सुंदर और ऐतिहासिक शहर — टिहरी।
कभी यह गढ़वाल रियासत की राजधानी हुआ करता था, जहाँ सांस्कृतिक धरोहर, परंपराएँ और इंसानियत एक साथ सांस लेती थीं। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब विकास के नाम पर यह शहर पानी में डूब गया।
आज जब हम टिहरी डैम का नाम लेते हैं, तो हमारी आँखों के सामने एक आधुनिक उपलब्धि तो आती है, पर उसके पीछे एक डूबा हुआ शहर और लाखों बिखरे सपनों की कहानी भी है।
टिहरी: जहाँ इतिहास सांस लेता था
पुरानी टिहरी सिर्फ एक शहर नहीं थी, बल्कि यह गढ़वाल साम्राज्य की राजधानी थी।
18वीं सदी में राजा सुधर्शन शाह ने इस शहर को बसाया था।
भागीरथी और भिलंगना नदियों के संगम पर बसी टिहरी अपने आप में एक सांस्कृतिक धरोहर थी —
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संकरी गलियाँ,
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पारंपरिक लकड़ी के घर,
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पुराना बाजार,
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मंदिरों की घंटियाँ,
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और पहाड़ी जीवन की सुगंध।
टिहरी का नाम गढ़वाली शब्द “त्रिहरी” से पड़ा — जिसका अर्थ होता है तीन पापों से मुक्ति (मन, वचन और कर्म से)।
कहा जाता था कि यहाँ स्नान करने से जीवन के तीनों दोष मिट जाते हैं।
टिहरी बाँध परियोजना की शुरुआत
स्वतंत्रता के बाद भारत में बिजली और सिंचाई की जरूरत बढ़ने लगी।
1950 के दशक में जब भारत ने जलविद्युत परियोजनाओं पर ध्यान देना शुरू किया, तो हिमालय की नदियों को ऊर्जा स्रोत के रूप में देखा गया।
भागीरथी नदी, जो गंगा की प्रमुख धारा है, को इसके लिए सबसे उपयुक्त माना गया।
1957 में पहली बार टिहरी बाँध परियोजना का विचार सामने आया,
लेकिन आर्थिक सीमाओं, तकनीकी चुनौतियों और स्थानीय विरोध के कारण यह लंबे समय तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही।
1978 में इस परियोजना को आधिकारिक रूप से स्वीकृति मिली,
और 1986 में इसका निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ।
बाँध निर्माण और पुरानी टिहरी की डूबती कहानी
टिहरी बाँध भारत का ही नहीं, एशिया का सबसे ऊँचा बाँध है —
इसकी ऊँचाई 260.5 मीटर और लंबाई लगभग 575 मीटर है।
बाँध के बनने से भागीरथी और भिलंगना नदियों का पानी रुकने लगा और एक विशाल झील बनने लगी।
यह झील धीरे-धीरे पुरानी टिहरी की ओर बढ़ी।
लोगों को चेतावनी दी गई कि शहर जल्द ही पानी में डूब जाएगा।
सरकार ने पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की —
नई टिहरी नाम से एक नया शहर बसाया गया, जो समुद्र तल से लगभग 1550 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
लेकिन यह स्थानांतरण सिर्फ मकानों का नहीं, बल्कि भावनाओं का भी था।
पुरानी टिहरी के लोग अपने घरों, मंदिरों, स्कूलों, स्मृतियों, और पुरखों की मिट्टी को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे।
दर्द की आवाज़ें — जब शहर डूब रहा था
1990 के दशक के मध्य में जब बाँध निर्माण तेज हुआ, तो पानी धीरे-धीरे शहर की ओर बढ़ने लगा।
लोगों ने अपनी छतों से घरों को डूबते देखा।
कुछ बुज़ुर्गों ने अपने आँगन की मिट्टी को पोटली में बांधकर साथ ले लिया, ताकि नई टिहरी में अपने अतीत की खुशबू साथ रख सकें।
एक वृद्ध महिला ने कहा था —
“घर तो फिर बन जाएगा, पर वह आँगन नहीं जहाँ मेरे बच्चों ने चलना सीखा था।”
टिहरी के मंदिर, बाजार, स्कूल, और घर – सब एक-एक कर जल में समा गए।
कई लोग वर्षों तक यह उम्मीद लगाए बैठे रहे कि शायद परियोजना रुक जाएगी,
पर विकास की गाड़ी किसी की भावना नहीं देखती।
क्या खो गया – एक सांस्कृतिक धरोहर
पुरानी टिहरी सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं थी,
वह एक संस्कृति का केंद्र थी।
शहर में लगभग 40 से अधिक प्राचीन मंदिर थे —
जिनमें भिलंगेश्वर महादेव, राजमहल, और घंटाघर बाजार विशेष प्रसिद्ध थे।
कला, संगीत और लोकनाट्य यहाँ के जीवन का हिस्सा थे।
डूबने के साथ ही न सिर्फ भवन बल्कि गढ़वाली परंपराओं की आत्मा भी मानो जल में समा गई।
टिहरी बाँध से क्या मिला देश को?
आज टिहरी बाँध उत्तर भारत की ऊर्जा आपूर्ति में बड़ी भूमिका निभा रहा है।
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1000 मेगावाट से अधिक बिजली का उत्पादन,
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270,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि की सिंचाई,
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दिल्ली और उत्तराखंड को पेयजल आपूर्ति,
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और बाढ़ नियंत्रण — ये सभी इसके लाभ हैं।
निस्संदेह, यह एक तकनीकी उपलब्धि है जिसने भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर किया।
लेकिन इन उपलब्धियों के पीछे छिपा है एक सवाल —
क्या विकास की कीमत इतनी बड़ी होनी चाहिए कि एक पूरा शहर मिटा दिया जाए?
विकास बनाम विस्थापन
टिहरी बाँध की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि
विकास और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
करीब 125 गाँवों के 100,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए।
नई टिहरी में उन्हें घर तो मिले, पर रोजगार और सामाजिक जुड़ाव नहीं।
कई बुजुर्ग अपने पुराने घरों की याद में डूबते रहे,
क्योंकि नई जगह पर सब कुछ नया था — मिट्टी, आसमान, और लोग भी।
पर्यावरणीय प्रभाव
बाँध ने केवल एक शहर को नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बदल दिया।
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भागीरथी नदी की धारा कमजोर हुई,
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कई वनस्पतियाँ और प्राणी विलुप्त हो गए,
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और जलवायु में भी परिवर्तन देखा गया।
वैज्ञानिकों ने इसे भूकंपीय दृष्टि से भी जोखिम भरा बताया,
क्योंकि यह क्षेत्र भूकंप जोन IV में आता है।
पुरानी टिहरी आज कहाँ है?
आज जब आप टिहरी झील के किनारे खड़े होते हैं,
तो उस शांत जल के नीचे एक पूरा शहर सोया हुआ है।
कभी-कभी जब पानी का स्तर घटता है,
तो पुराने मंदिरों के शिखर या घरों की छतें झाँकती नज़र आती हैं —
जैसे अतीत हमें पुकार रहा हो।
कई डॉक्यूमेंट्री और फोटोग्राफरों ने इन पलों को कैद किया है।
पर सच यह है कि पुरानी टिहरी अब इतिहास बन चुकी है।
नई टिहरी – उम्मीद का शहर
नई टिहरी आज एक योजनाबद्ध और स्वच्छ शहर के रूप में उभरी है।
यहाँ सरकारी दफ्तर, स्कूल, अस्पताल, और सुंदर कॉलोनियाँ हैं।
टिहरी झील अब पर्यटन का केंद्र बन चुकी है —
जहाँ बोटिंग, पैरासेलिंग, और कयाकिंग जैसी गतिविधियाँ होती हैं।
हर साल यहाँ टिहरी झील महोत्सव आयोजित होता है,
जो स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और पहचान दोनों लाया है।
भावनाएँ जो मिटती नहीं
लेकिन पुरानी टिहरी के लोग आज भी अपने दिल में उस शहर को ज़िंदा रखे हुए हैं।
त्योहारों में जब वे पुराने गीत गाते हैं,
तो उनके स्वर में एक दबी हुई पीड़ा और गहरी यादें झलकती हैं।
कई परिवार आज भी अपने बच्चों को बताते हैं —
“यहीं कभी हमारा घर था, अब वह झील के नीचे है।”
निष्कर्ष
पुरानी टिहरी का डूबना सिर्फ एक भूगोल का परिवर्तन नहीं था,
वह मानवता, स्मृतियों और विकास के संघर्ष की कहानी है।
टिहरी डैम ने देश को रोशनी दी,
पर उसने कई आँखों से वो रोशनी छीन ली जो अपने घरों को डूबते देख रही थीं।
शायद आने वाले समय में जब हम विकास की नई परियोजनाएँ बनाएं,
तो पुरानी टिहरी हमें यह सिखाए कि —
“विकास की सबसे बड़ी कीमत इंसान की यादें नहीं होनी चाहिए।”
अंतिम संदेश
पुरानी टिहरी भले ही अब जल में समा गई हो,
पर उसकी आत्मा आज भी भागीरथी की लहरों में बहती है।
वह हमें यह याद दिलाती रहती है कि हर प्रगति के पीछे एक कहानी होती है — और हर कहानी का एक भावनात्मक मूल्य।
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