स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास लिखने के माध्यम से करने पर सबसे पहले आप खुद के मन को समझने लगते है . और जैसे जैसे आप अपने मन को समझने लगते है वैसे वैसे आप अपने जीवनसाथी के मन को भी समझने लगते है .
यह शिक्षा पति पत्नी के रिश्ते को मधुर बना देती है
आज मेरे प्यारे मित्रों आप का अपना मुकेश स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास के माध्यम से पति पत्नी के रिश्ते को मधुर बनाने के विषय में समझा रहा है .
सबसे पहले आप दोनों अपने जीवन में चाहते क्या है . इसे आप दोनों पति पत्नी एकांत में अलग अलग बैठकर किसी पेपर पर लिखे .
और फिर इस पेपर को अपनी अलमीरा में छिपा कर रख दे .
अब दूसरे दिन फिर से एकांत में बैठकर आप
अपने जीवन में चाहते क्या है को लिखे . और फिर से इस पेपर को अलमीरा में छिपा के
रख दे .
इस प्रकार से आप दोनों पति पत्नी पांच दिन तक ऐसे ही लिखे और सभी पेपरों को अपनी अलमीरा में छिपा के रख दे .
ध्यान रहे आप दोनों अभी तक इन पेपरों में क्या लिखा है उसे एक दूसरे से साझा न करे .
अब छठे दिन दोनों पति पत्नी एकांत में अलग अलग जगह बैठकर इन सभी पेपरों को ध्यान से एक एक करके पढ़े .
आप
अब इन पेपरों को ध्यान से पढ़ने के कारण अपने मन की मूर्खता पर हसेंगे . क्यों की
अब आप को इस सच्चाई का पता चल जायेगा की अभी आप को यही साफ़ साफ़ पता नहीं है की
आखिर आप अपने जीवन में चाहते क्या है ?
क्यों की जब आप दोनों पति पत्नी इन पेपरों को बहुत ही एकाग्रता के साथ पढ़ते है तो आप के मन में चल रहे द्वन्द इन पेपरों के माध्यम से आप को खुद को समझाने के लिए दृश्य रूप में बाहर आ जाते है .
अर्थात ऐसा करके आप अपने अवचेतन मन में जमा आदतों को बाहर निकालने में शत प्रतिशत सफल होने लगते है .
अर्थात
आप को यह ज्ञान होने लगता है की आप की चाहते समय के साथ बदल जाती है .
इसलिए स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास लिखने के माध्यम से करने पर सबसे पहले आप खुद के मन को समझने लगते है . और जैसे जैसे आप अपने मन को समझने लगते है वैसे वैसे आप अपने जीवनसाथी के मन को भी समझने लगते है .
जब आप को पूरी तरह यह लगने लग जाए की अब मुझे मेरे जीवन साथी के साथ एकांत में बैठकर इस विषय पर चर्चा करनी चाहिए की हम दोनों साथ मिलकर जीवन को कैसा विकसित करना चाहते है .
जैसे आप एक बहुत ही बहादुर और बुद्धिमान संतान को जन्म देना चाहते है तो पहले आप दोनों को बहादुर और बुद्धिमान इंसान बनना पड़ेगा .
अब
मुकेश आप को बहादुरी का वास्तविक अर्थ समझा रहा है :
यदि आप की पत्नी
आप के लिए आज के भोजन में नमक ज्यादा मिला देती है तो आप अपनी पत्नी से कहे
धन्यवाद मेरे दोस्त आज आप ने बहुत ही स्वादिष्ट भोजन बनाया है . मै यह भलीभांति
समझता हूँ की ऐसा कहना इतना आसान नहीं होता है जब सामने वाला पत्थर मारे और हमे
उसे ह्रदय से प्रेम पूर्वक प्रणाम करना हो . पर हमे यह भी स्वीकार करना पड़ेगा की
सामने वाले का व्यवहार वैसा ही होता है जैसा हमने उसे कभी न कभी ऐसा व्यवहार दिया
है . इसलिए मुकेश आप से कहता है की आप को यदि
पति पत्नी के रिश्ते को मधुर बनाना है तो फिर यह तपस्या तो करनी ही पड़ेगी .
बिना तप के ख़ुशी प्राप्त करना असंभव कार्य है .
यदि आप ऐसा पूर्ण निष्ठा के साथ कहने में समर्थ हो जाते है तो आप इस कार्य के लिए बहादुर इंसान में रूपांतरित हो जाते है .
अर्थात स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास इस तरह से करके आप ने अपने भीतर अवचेतन मन में जमा कायरता के संस्कार को बहादुरी के संस्कार में रूपांतरित कर दिया है .
मतलब मुकेश आप को यह समझा रहा है की जब आप किसी से यह ज्ञान सुनते हो की अपने भीतर के विकारों को योग , व्यायाम और ध्यान के माध्यम से बाहर निकालो तो इसका मतलब अभी आप पूर्ण सच्चे ज्ञान से नहीं जुड़े हो .
ऐसी ज्ञान की बाते केवल आंशिक रूप से ही
सत्य है . क्यों की विकार को बाहर निकलने से पति पत्नी का रिश्ता पूरी तरह से मधुर
नहीं हो सकता है .
क्यों की ये विकार जबतक अच्छे भावों के माध्यम से रचनात्मक गुणों में रूपांतरित नहीं हो जाते तब तक पति पत्नी का रिश्ता मधुर नहीं बन सकता है .
इसलिए
स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास आप के स्वभाव को मधुरता में रूपांतरित करता है .
पत्नी को भोजन में नमक ज्यादा होने के लिए डाँटना आप के लिए बहुत आसान होता है . क्यों की इसके लिए आप को बिना ध्यान के निचे गिरना होता है .
पर जब आप खुद की सच्ची ख़ुशी के लिए संकल्प ले लेते है तो फिर आप को निचे गिरने के बजाय ऊपर उठना अनिवार्य है .
और ऊपर
उठने के लिए अपनी बुरी वासनाओं की सच्ची ख़ुशी के पवित्र यज्ञ में कुर्बानियाँ देनी
पड़ती है .
इसलिए जब आप एक एक करके इन बुरी आदतों की कुर्बानियाँ देने लगते है तो धीरे धीरे आप एक बहादुर इंसान में रूपांतरित होने लगते है . और इसके साथ साथ आप की बुद्धि जाग्रत होने लगती है .
मुकेश की ये बाते पढ़ने में बहुत अच्छी लगती है . पर जब आप इन बातों पर भीतर से खुद की ख़ुशी के लिए पहले बिना संकोच के विश्वास कर लेते है और अभ्यास के माध्यम से अपने जीवन में उतारने लगते है तो आप को शुरू में बहुत पीड़ा होती है .
पर मै मुकेश आप को यह परमात्मा को
साक्षी मानकर विश्वास दिलाता हूँ की यह पीड़ा आप के संचित भाग्य अर्थात अवचेतन मन
को ख़ुशी के मन में रूपांतरित करने की होती है .
ठीक इसी प्रकार जब पति अपनी पत्नी के लिए कोई हलकी चीज खरीद कर दे तो पत्नी को इस चीज को ही सोने की मोहर मानकर पवित्र ह्रदय से स्वीकार करना चाहिए .
ऐसा करने से आप पत्नी अपने पति का अपने मधुर रिश्ते के लिए ह्रदय परिवर्तन करने में शत प्रतिशत सफल होने लगोगी .
जब
पति पत्नी पहले पांच दिन एकांत में बैठकर पेपर पर लिखकर अपने मन को पढ़ने का अभ्यास
करते है तो फिर दोनों को यह समझ आने लगता है की हमे एक दूसरे की सेवा करनी है .
और जब पति पत्नी एक दूसरे को ही भगवान् मानकर सेवा करते है तो फिर ऐसे रिश्ते में परमात्मा को मधुरता लानी पड़ती है .
अर्थात पति पत्नी अपने सच्चे पिता को केवल प्रेम से ही जीत सकते है और जो भी आप को चाहिए परमात्मा को वह चीज आप को देनी ही पड़ती है .
पर यदि पति और पत्नी ये पांच दिन पेपर लिखने का अभ्यास नहीं करते है और सीधे एक दूसरे से बात करके अपने रिश्ते को सुधारना चाहे तो इसमें कई प्रकार के खतरे है .
क्यों
की जब मै पहले मेरे मन को ही ठीक से नहीं समझ पा रहा हूँ तो सामने वाले के मन को
कैसे समझूंगा .
मुझे लगता तो है की मुझे मेरे मन का ज्ञान है . पर वास्तविक सत्य यह है की यह भी एक मन का ही धोखा है .
यदि मुझे मेरे मन का ही ज्ञान होता तो हमारे रिश्ते में ये समस्याएं आती ही नहीं . या फिर मै समस्याओं को प्रारब्ध मानकर भोग रहा होता या रूपांतरित कर रहा होता है . अर्थात मन की समझ होने पर जीवन शिकायतों से मुक्त होने लगता है और जीवन में शुभ अवशरो का आगमन शुरू हो जाता है .
जब दोनों पति पत्नी अपने कर्म करने की
स्वतंत्र शक्ति से अपने भीतर पवित्र संस्कारो की खेती करने लगते है तो फिर इनके घर
में आने वाली संतान अपने आप ही संस्कारवान होती है . ऐसी संतान बहादुर और बहुत
बुद्धिमान होगी और ऐसी संतान अपने जीवन में बहुत से महान कार्य करने लगती है .
अर्थात स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से यदि आप एक बार सकारात्मक दिशा पकड़ लेते है तो फिर जीवन में आने वाली बाधाओं से आप घबराने की बजाय उन्हें शुभ अवशर में रूपांतरित करने लगते है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
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