यदि प्रभु की इच्छा है तो ही आप इस लेख को पढ़ पायेंगे

दोस्त हम सभी आत्मायें लगातार प्रभु से ही प्रकट हो रही है . और प्रभु की इच्छा से ही प्रभु अपने ज्ञान का विस्तार करने के लिए हम सभी को अलग अलग किरदारों में नचाते है .

यदि प्रभु की इच्छा है तो ही आप इस लेख को पढ़ पायेंगे

मेरे दोस्त तुम जब अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए कोई नया काम शुरू करते हो और उस काम को आगे बढ़ाने के लिए दो चार आदमी भी काम पर रखते हो .

अब कुछ दिन तक तो आप का काम बहुत अच्छा चलता है और फिर अचानक से आप के साथ कई प्रकार के नाटक होना शुरू हो जाते है .

जैसे :

  • आज पेट में दर्द है
  • आज कर्मचारी काम पर नहीं आया
  • आज घर में झगड़ा हो गया इत्यादि
  • अब आप यह सोचते है की मै मेरे सपने को पूरा क्यों नहीं कर पा रहा हूँ ?

जबकि मै कर्मचारी को समय पर वेतन भी दे रहा हूँ . पर कर्मचारी मै जैसा काम चाहता हूँ वैसा नहीं करता है .

ठीक इसी प्रकार से आप के साथ यह परेशानी भी आती है की जिस पहले दिन आप ने काम शुरू किया था तो आप को यह लगा था की अब मै बहुत खुश रहूँगा क्यों की अब मै मेरी रूचि का ही काम कर रहा हूँ .

पर काम करते हुए दो महीने बाद आप को इसी रूचि वाले काम में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है .

अर्थात अब आप चाहकर भी इस रूचि वाले काम को नहीं कर पाते है .

तो कभी आप ने यह सोचा है की जिस काम को करने से पहले आप को यह लगता था की यह काम तो मेरी रूचि का ही है इसलिए मुझे इसमें शत प्रतिशत सफलता मिलेगी .

पर अब आप के साथ हो उल्टा रहा है.

और आप ने बहुत ही ध्यान से इन दो महीनों में अपना काम पूरा मन लगाकर किया है .

फिर आखिर आप से कहाँ गलती हुयी है की अब कर्मचारी या अन्य लोग या आप का खुद का मन इसी काम में अरुचि या परेशानियों का नाटक क्यों कर रहा है ?

आप के साथ घटित हो रही इस प्रकार की घटना को जब आप एकांत में समझने का अभ्यास करते है तो आप को इसके पीछे के वास्तविक कारणों का साफ़ साफ़ पता चलने लगता है .

और इसी खोज को मेने स्वरुप दर्शन क्रिया का नाम दिया है .

अर्थात जब आप खुद के लिए एकांत में समय निकालकर अपने मन की कार्यप्रणाली को समझने का अभ्यास करते है तो आप को यह पता चलने लगता है की आप किसी ऐसी शक्ति से नियंत्रित है जिसमे निम्न प्रकार का ज्ञान छिपा हुआ है :

  • एक ही समय में आप के सामने अलग अलग परिस्थितियों को प्रकट करना
  • उसी समय आप के मन से किसी जरुरी काम को भुला देना
  • उसी समय यह शक्ति क्रोध का रूप ले लेती है
  • उसी समय यह शक्ति ख़ुशी का रूप ले लेती है
  • उसी समय आप को यह लगने लगता है की संसार में कोई किसी का नहीं है
  • और उसी समय आप को यह लगने लगता है की पूरा संसार आप से प्रेम करता है

अब आप यह सोच रहे है की ऐसा क्यों होता है और ऐसी स्तिथि से बाहर कैसे आये ताकि आप का मन हमेशा एक सही दिशा में निरंतर लगा रहे .

मेरे दोस्त पहली बात तो मै आप को यह बता दू की यह कहानी आप के अकेले की नहीं है .

हम सभी के साथ जीवन में कभी न कभी ऐसा ही होता है .

और ऐसा हमारे साथ हमारे ही माध्यम से प्रभु ने कर्म करके किया है .

अब आप अवश्य चौकेंगे .

अब आप यह सोच रहे है की मेरे मन ने किया है , मेरे शरीर ने किया है .

पर यह बात केवल आंशिक सत्य ही है .

मेने ऊपर जो शक्ति बताई है उसे ही मै परमात्मा कहता हूँ . कोई अन्य इंसान इसे अलग नाम से पहचानता है .

दोस्त हम सभी आत्मायें लगातार प्रभु से ही प्रकट हो रही है . और प्रभु की इच्छा से ही प्रभु अपने ज्ञान का विस्तार करने के लिए हम सभी को अलग अलग किरदारों में नचाते है .

आप ने कई बार बोलचाल में भी सुना होगा की :

  • ज्यादा मुझे नचाये मत
  • या मै आप के इशारों पर नहीं नाचने वाली
  • या अरे रामु तो बहुत ही भोला लड़का है वह तो मेरी उंगलियों पर नाचता है


ऐसे और भी वाक्य आप ने रोजमर्रा की जिंदगी में सुने है .

जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को पता चलने लगता है की खुद प्रभु ही आप की आत्मा को सुख दुःख की अनुभूति करा के प्रशिक्षित कर रहे है .

अर्थात प्रभु आप की आत्मा के माध्यम से यह बोल रहे है की आप के सामने दो रास्ते है :

पहला रास्ता खड्डे की तरफ जाता है

और दूसरा रास्ता आप के घर की तरफ जाता है

अब निर्णय आप को लेना है की आप कोनसा रास्ता चुनते है .

यदि उस समय आप आत्मनुभूति में है तो आप घर का रास्ता ही चुनेंगे

वरना बेहोशी में आप हमेशा खड्डे की तरफ जायेंगे .

और आप उस समय आत्मनुभूति में रहेंगे या नहीं यह आप की आत्मा की अब तक की यात्रा पर निर्भर करता है .

यदि आप अपना जीवन इस प्रकार से जी रहे है जैसे एक पूरी तरह जाग्रत इंसान जीता है .

तो फिर आप की आत्मा प्रकाशित होने लगती है .

अर्थात वास्तविक रूप में आप आत्मा है शरीर नहीं है .

आप का शरीर भी इसी प्रभु की शक्ति से निर्मित हो रहा है , सुरक्षित हो रहा है और परिवर्तित हो रहा है .

इसीलिए आप को अपने मन और शरीर में ये जो जितने भी परिवर्तन महसूस होते है वे इन्ही तीन कारणों से प्रकट होते है .

जैसे आप एक पत्थर को देखते है तो आप को यह लगता है की जैसा मेने इसको कल देखा था वैसा ही यह आज भी है .

पर यह वास्तविक सत्य नहीं है .

यह पत्थर कल जैसा बिलकुल भी नहीं है . इसमें कई प्रकार के परिवर्तन हो चुके है .

क्यों की इस पूरे ब्रह्माण्ड में हर एक कण के ऊपर कई प्रकार के आकर्षण और प्रतिकर्षण बल लगातार कार्य कर रहे है .

इसलिए ठीक इसी प्रकार से हमारे मन और शरीर पर भी कई प्रकार के बल लगातार कार्य कर रहे है .

स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से आप इन बलों के साथ अपना संतुलन धीरे धीरे बनाने लगते है .

आप के इसी संतुलन को स्थिरप्रज्ञता या समता भाव कहते है .

इसलिए मेरे दोस्त जब आप को बहुत बुरा लगे या कैसा भी डर लगे तो किसी के सामने नहीं रोकर आप अकेले में अपने भीतर विराजमान प्रभु के सामने अपना सारा मन का गुबार बाहर निकाल दे .

  • फिर चाहे आप को जोर जोर से रोना पड़े
  • या जोर से हंसना पड़े
  • या प्रभु के साथ आप नाचने लग जाए
  • या कुछ भी करे 

कुछ ही देर में आप की आत्मा के ऊपर से यह बोझ हटने लगता है . और आप की चेतना एक कदम आगे प्रकाशित हो जाती है .

मतलब आप की आत्मा ऊपर की तरफ एक कदम बढ़ जाती है . इस प्रकार से नियमित अभ्यास करने से आप धीरे धीरे सभी प्रकार के कष्टों से हमेशा के लिए मुक्त होने लगते है .

धन्यवाद जी . मंगल हो जी .