कुछ भी हम इस संसार में हमारी इन्द्रियों से देख रहे है वह केवल आंशिक सत्य ही है . परम सत्य यह है की खुद परमात्मा ही इन दोनों ख्यातियों के रूप में यह लीला कर रहे है .
प्रेमानंद जी महाराज और आचार्य प्रशांत जी की सच्चाई
प्रेमानंद जी महाराज और आचार्य प्रशांत जी की सच्चाई
मेरे भाई यदि आप अभी इन दोनों ख्यातियों से अच्छे से परिचित नहीं हो तो आज आपका छोटा भाई मुकेश आप को इन दोनों की सच्चाई से रूबरू करवाएगा .
दोस्त
यदि आप किसी भी इंसान में गुण देखने लगेंगे तो आप को हर प्रकार के इंसान में बहुत
ही अच्छे गुण दिखाई देने लगेंगे .
और यदि आप किसी इंसान में दोष देखने लगेंगे तो आप को उस महान इंसान में भी दोष ही दोष दिखाई देने लगेंगे .
अर्थात प्रेमानंद जी महाराज की जीवनशैली भी हमारे लिए महान है और आचार्य प्रशांत जी की जीवन शैली भी महान है . ये दोनों ही आप ही की चेतना की उच्च अवस्था है . अर्थात आप खुद इनके भीतर भी है और बाहर भी है .
दोनों
ही संत अपनी अपनी जगह महान है .
यदि हम दोनों में तुलना करेंगे तो इसका मतलब अभी हम जाग्रत नहीं है .
इसलिए जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को धीरे धीरे यह पता चलने लगता है की खुद परमात्मा ही इन सभी जीवों के रूप में प्रकट हो रहे है .
प्रेमानंद जी कहते है नाम जप करो . इससे
आप का कल्याण हो जायेगा .
क्या यह बात शत प्रतिशत सच है ?
जी हाँ .
यदि कोई इंसान पूरी सच्चाई के साथ नाम का जाप करता है तो उसका मन प्रभु से जुड़ने लगता है . और उसे धीरे धीरे सम्पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति होने लगती है .
फिर आचार्य प्रशांत जी कहते है की नाम जाप पूरी तरह से कल्याण नहीं कर सकता है . और ऐसा मै यूट्यूब पर देखने के बाद बोल रहा हूँ . अब यदि उन्होंने ऐसा कहा है तो इसका मतलब भी यही है की आचार्य प्रशांत जी अपनी जगह शत प्रतिशत सही है .
और यदि
उन्होंने ऐसा नहीं कहा है तो आप मेरी बात को नज़रअंदाज कर दे .
क्यों की जब कई
व्यक्ति नाम जाप करते है तो उनको नींद आने लगती है . या वे ऊबने लगते है . या फिर
वे नाम को ही रटने लगते है और दैनिक जीवन की क्रियाओं को सही से क्रियान्वित नहीं कर पाते
है .
मतलब आप का दोस्त मुकेश यह कहना चाहता है की एक ही दवा अलग अलग मरीजों पर अलग अलग प्रभाव छोड़ती है .
और
ऐसा इन मरीजों के मन और दवा देने वाले चिकित्सक के मनो की कार्य प्रणाली पर निर्भर
करता है .
जैसे मेने एक वीडियो में देखा था की उसमे प्रशांत जी कह रहे है की बच्चो को बद्तमीज होना चाहिए . बच्चों को मूर्ति बनकर नहीं रहना चाहिए .
अब उनकी यह वीडियो सच्ची है तो मै अब आपको उनके कहने का सही मतलब समझा रहा हूँ .
जब कोई इंसान बहुत ज्यादा जोश में आ
जाता है तो फिर वह कुछ भी बोलने लगता है . पर उसके भक्तों को उसकी ये बाते भी
अच्छी लगती है .
अब आप पूछेंगे की यदि आप से कोई बच्चा बदतमीजी करे तो क्या आप को अच्छा लगेगा ?
मै कहूंगा बिलकुल नहीं .
फिर
उनके भक्त इस बात को सही क्यों बताते है ?
क्यों की जो कुछ भी हम इस संसार में हमारी इन्द्रियों से देख रहे है वह केवल आंशिक सत्य ही है .
परम सत्य यह है की खुद परमात्मा ही इन दोनों ख्यातियों के रूप में यह लीला कर रहे है .
आप ने कई बार कोई चाबी रखकर भूली होगी ?
अब
आप इसका कारण पता करने निकलेंगे तो आप अनंत जन्म तक पता करने के बाद भी कुछ नहीं
जान पायेंगे .
क्यों की जो चीज हकीकत में है ही नहीं उसको ढूंढेंगे कैसे ?
हकीकत यह है की केवल परमात्मा का अस्तित्व है . और आप को ऐसी अनुभूति तभी हो सकती है जब आप ज्ञानी और अज्ञानी दोनों का बराबर सम्मान करे .
अब आप के मन में यह प्रश्न आयेगा की यदि
हम अज्ञानी का भी सम्मान करेंगे तो फिर हमारे भीतर भी अज्ञान बढ़ेगा .
नहीं . ऐसा कभी नहीं होगा .
आप मुझे यह बताये की यदि हमारे पैर पर कोई बड़ा फोड़ा हो जाए और उसमे से असहनीय बदबू आने लगे तो क्या हम फोड़े या पैर को कटा देते है ?
नहीं .
हम फोड़े को हमारे साथ ही रखते है .
ठीक इसी प्रकार से माया भी एक अज्ञान ही
है . पर यह अज्ञान खुद प्रभु से ही प्रकट हो रहा है .
इसे मै अज्ञान इसलिए कह रहा हूँ की जो शक्ति कण कण में व्याप्त है वही शक्ति माया के रूप में प्रकट हो रही है .
इसलिए माया कभी भी इस निराकार शक्ति से ज्यादा ज्ञानी नहीं हो सकती है .
अर्थात माया खुद प्रभु की दासी है .
पूरी प्रकृति प्रभु की दासी है . हम खुद प्रभु के चरणों के दास है .
जैसे यदि मेरे और आप के बीच कोई प्रतिस्प्रधा हो जाए और आप मुझसे आगे निकल जाए तो मेरे भक्तों को आप से ईर्ष्या होने लगेगी .
अर्थात
प्रकृति में एक सही और एक गलत होता है . यही प्रकृति का कठोर नियम है .
इसलिए जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप प्रेमानंद जी महाराज , आचार्य प्रशांत जी और अन्य सभी साधु संतो का बराबर सम्मान करने लगते है .
क्यों की आप इन सभी में केवल अपने प्यारे प्रभु को ही देखने लगते है .
और सच यही है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
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