यह कहानी मेरी दादी माँ ने मुझे सुनाई थी, जिसमें उन्होंने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय कभी भारत का सबसे बड़ा ज्ञान का केंद्र था। वहाँ लाखों किताबें थीं, दुनिया भर से छात्र पढ़ने आते थे। लेकिन 1193 ईस्वी में बख्तियार खिलजी ने इसे जला दिया — किताबें तीन महीने तक जलती रहीं। दादी माँ कहती हैं कि अगर नालंदा आज होता, तो भारत शिक्षा में दुनिया का नेता होता। ये सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि हमारी खोई हुई विरासत थी।
नालंदा: भारत का खोया हुआ ज्ञान मंदिर
बेटा, आजकल तो हर शहर में कॉलेज हैं, हर हाथ में मोबाइल और इंटरनेट है, पर क्या तुझे पता है कि एक ज़माना था जब भारत का नाम पूरी दुनिया में शिक्षा के लिए लिया जाता था? उस समय एक विश्वविद्यालय था, जिसका नाम था — नालंदा विश्वविद्यालय।
नालंदा की स्थापना
ये बात है गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम की, जिन्होंने ईसा के 5वीं शताब्दी (लगभग 427 ईस्वी) में इस महान विश्वविद्यालय की नींव रखी थी। बेटा, नालंदा कोई मामूली स्कूल नहीं था — ये तो पूरे एशिया का सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था।
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यहाँ 10,000 से ज़्यादा विद्यार्थी और 1,500 शिक्षक रहते थे।
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चीन, जापान, तिब्बत, कोरिया से भी छात्र पढ़ने आते थे।
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यहाँ बौद्ध धर्म, वेद, अर्थशास्त्र, ध्यान, संस्कृत, चिकित्सा, गणित और न जाने कितने विषय सिखाए जाते थे।
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एक समय पर चीन के महान यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) भी यहाँ पढ़ने आए थे और उन्होंने कहा था कि नालंदा जैसी जगह पूरे संसार में नहीं है।
पुस्तकालय का खज़ाना
नालंदा में एक बहुत बड़ा पुस्तकालय था, बेटा, इतना बड़ा कि उसे "धर्मगंज" कहा जाता था। उसमें तीन मुख्य भाग थे — रत्नसागर, रत्नोदधि, और रत्नरंजन। कहते हैं उसमें 9 मिलियन (90 लाख) से भी ज्यादा पांडुलिपियाँ थीं।
"तो फिर दादी, उसे किसने जलाया?"
बेटा, ये कहानी बहुत दुखद है। ये तब की बात है जब भारत पर तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने हमला किया था।
1193 ईस्वी – तबाही की शुरुआत
सन 1193 ईस्वी में, जब बख्तियार खिलजी ने बिहार पर हमला किया, तब उसने नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया। कहा जाता है कि वो खुद अनपढ़ था और जब उसने देखा कि लोग किसी गुरु के बिना किताबें पढ़कर विद्वान बन रहे हैं, तो उसकी असुरक्षा और घमंड ने उसे अंधा बना दिया।
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उसने नालंदा को आग के हवाले कर दिया।
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पुस्तकालय में रखी लाखों किताबें तीन महीने तक जलती रहीं।
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उसने सैकड़ों विद्वानों को मार डाला, और हज़ारों छात्रों को भगा दिया।
इतिहासकारों ने लिखा है कि यह विश्व ज्ञान का सबसे बड़ा नुकसान था।
नालंदा क्यों थी इतनी खास?
बेटा, नालंदा सिर्फ किताबों का ढेर नहीं था — वो तो ज्ञान का मंदिर था।
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वहाँ शांति और ध्यान के साथ शिक्षा दी जाती थी।
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छात्र तर्क, विज्ञान, और धर्म के साथ जीना सीखते थे।
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भारत के सॉफ्ट पावर का सबसे बड़ा केंद्र वही था।
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वहाँ का पाठ्यक्रम आज के "ऑक्सफोर्ड" या "हावर्ड" से कहीं आगे था।
अगर नालंदा आज होता...
अगर बेटा, नालंदा न जलता...
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तो भारत आज शिक्षा का सिरमौर होता।
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दुनिया के लोग हमारे यहाँ पढ़ने आते।
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हो सकता है कि भारत आज तकनीकी, विज्ञान, और अध्यात्म में सबसे आगे होता।
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हमारी संस्कृति और भाषा का प्रचार विश्व भर में होता।
"अब क्या कर सकते हैं दादी?"
बेटा, हम इतिहास को बदल नहीं सकते, पर उससे सीख सकते हैं। आज भारत में फिर से नालंदा विश्वविद्यालय को 2014 में नए रूप में शुरू किया गया, जहाँ फिर से अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ने आने लगे हैं। पर वो पुरानी रौनक अब भी एक सपना सी लगती है।
मुख्य ऐतिहासिक तिथियाँ:
| घटना | वर्ष |
|---|---|
| नालंदा की स्थापना | लगभग 427 ईस्वी (कुमारगुप्त प्रथम) |
| ह्वेनसांग का आगमन | 7वीं शताब्दी (लगभग 630 ईस्वी) |
| बख्तियार खिलजी द्वारा विध्वंस | 1193 ईस्वी |
| पुनर्स्थापना प्रयास (नई नालंदा) | 2014 ईस्वी |
अंत में...
बेटा, जब भी किताब पढ़ो, ज्ञान लो, तो उन पांडुलिपियों को याद करना जो कभी नालंदा की अलमारियों में रखी थीं — और जिन्हें आग ने जला डाला, लेकिन यादें आज भी जीवित हैं।
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