मुझे नौकरी करनी चाहिए या व्यवसाय ?
09 Feb, 2026
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मुझे नौकरी करनी चाहिए या व्यवसाय—यह निर्णय केवल सोचने से नहीं लिया जा सकता। स्वरुप दर्शन के अभ्यास से मन के भ्रम स्पष्ट होते हैं और यह समझ आता है कि नौकरी और व्यवसाय दोनों ही मन के विचार हैं। सही निर्णय अनुभव, विश्वास और परमात्मा के प्रति समर्पण से जन्म लेता है।
आप को सबसे पहले स्वरुप दर्शन का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए . क्यों की जब आप स्वरुप दर्शन का अभ्यास शुरू करते है तो आप को आप का भविष्य साफ़ साफ़ दिखने लगता है की आप के लिए नौकरी सही है या व्यवसाय .
अब जानते है कैसे ?.
आप जिसे नौकरी कहते है उसका मतलब आप यह समझते है की आप का कोई मालिक होगा और आप उसके बताये अनुसार ही काम करेंगे .
फिर आप यह सोचते है की नौकरी में मैं ज्यादा सुरक्षित हूँ क्यों की यदि मेरे मालिक को नुक्सान भी हो जायेगा तो भी मेरी महीने की पगार तो पक्की है .
फिर आप यह सोचते है की यदि किसी कारणवस यदि मेरे मालिक की कंपनी या जो भी संस्था है यदि वह बंद भी हो जाएगी तो मैं दूसरी नौकरी पकड़ लूंगा .
फिर आप यह सोचते है की यदि नौकरी में मेरे और मेरे मालिक या सहकर्मियों के बीच आप सी अनबन रहती है तो भी मैं यह नौकरी छोड़कर दूसरी पकड़ लूंगा .
फिर आप यह भी सोचते है की जल्दी पैसा कमाने के लिए मुझे नौकरी करने में ही ज्यादा फायदा है , व्यवसाय को तो शुरू करने में ही पैसे की जरुरत पड़ती है .
आप व्यवसाय के बारे में यह भी सोचते है की मेरे लिए व्यवसाय नौकरी से ज्यादा फायदेमंद है क्यों की इसमें मैं इसे कितना भी बड़ा कर सकता हूँ .
व्यवसाय के बारे में आप यह भी सोचते है की मेरे व्यवसाय में सबकुछ मेरी ही मर्जी चलेगी . यहां मालिक के इशारों पर नाचना नहीं पड़ेगा .
इस प्रकार से और भी तमाम प्रकार के खुरापाती विचार आप के मन में दिन रात चलते रहते है .
अब मैं आप को स्वरुप दर्शन के आधार पर जवाब देने जा रहा हूँ :
व्यवसाय और नौकरी दोनों शत प्रतिशत समान है पर दिखने में भिन्न है .
जब आप गहराई से एक एक बिंदु पर दोनों की तुलना करेंगे तो आप पाएंगे की हर बिंदु पर दोनों के अपने अपने स्तर पर फायदे और नुकसान है .
जैसे मैं आप को मापने के लिए एक बिंदु पर उदाहरण देकर समझाता हूँ :
व्यवसाय में मालिक मैं खुद हूँ इसलिए किसी और के इशारों पर मुझे नाचना नहीं पड़ेगा .
अब मैं आप को इस उपरोक्त बिंदु को नौकरी और व्यवसाय के साथ वास्तविक सम्बन्ध के बारे में समझा रहा हूँ .
आप कह रहे है की नौकरी में मालिक जैसा कहता है वैसा ही काम करना पड़ता है .
पर व्यवसाय में भी जैसा आप का ग्राहक कहता है वैसा ही माल आप को देना पड़ता है . अब यदि जैसा ग्राहक चाहता है वैसा माल तैयार करने में यदि आप को नौकरी से भी ज्यादा माथापच्ची करनी पड़े तो आप क्या करेंगे ?.
आप एक एक बात पर तो अपना व्यवसाय बंद करके घर नहीं आ जायेंगे ?.
और यदि आप का घर आप के व्यवसाय से ४०० - ५०० किलोमीटर दूर है तो फिर तो आप को बात बात पर व्यवसाय को बंद करने में बहुत परेशानी होगी .
और यदि आप ने व्यवसाय बड़ा कर लिया और आप ने कर्मचारी भी रख लिए तो तब आप क्या करेंगे की जब आप ने एडवांस में ग्राहकों से आर्डर बुक कर लिए हो और अब जब माल तैयार करने की बारी आयी तो अब आप के कर्मचारी काम पर नहीं आने के निम्न बहाने बना रहे है :
आज तबियत सही नहीं है (जबकि सच यह है की वह आज पत्नी को शॉपिंग कराने ले जा रहा है )
आज शादी में जाना है
और भी कई शानदार शानदार बहाने आप को फ़ोन पर ही सुनने को मिल सकते है .
तब आप समझ सकते है की आप की दशा कैसी होगी .
इसी प्रकार से नौकरी में भी अनेक प्रकार की रोज रोज नयी नयी समस्याएं आती रहती है .
पर जब आप स्वरुप दर्शन का अभ्यास करते है तो आप को पता चलेगा की जब तक आप कुछ काम करके ही नहीं देखेंगे तो उस काम को करने के दौरान आप को क्या क्या महसूस होगा ये सब आप बिना करे कैसे महसूस कर सकते है.
'
जैसे मेने बोला रसगुल्ला मीठा है और आप ने मुझे रसगुल्ला खाते हुए देख भी लिया पर आप को क्या पता मुझे इस रसगुल्ले में कितना और कैसा स्वाद आ रहा है .
जब तक आप खुद रसगुल्ला खाकर नहीं देखेंगे तब तक आप रसगुल्ले से सम्बंधित तमाम जानकारिया जो आप रोज एकत्रित करते है वे महज केवल जानकारिया मात्र है . मतलब तथ्य है अनुभव नहीं है.
अब आप पूछेंगे की मैं निर्णय तो लेना चाहता हूँ पर पता नहीं क्यों नहीं ले पाता हूँ. या फिर आप अपने निर्णय के लिए किसी और को जिम्मेदार मानते हो .
अब मैं आप को स्वरुप दर्शन के माध्यम से इसका शत प्रतिशत वास्तविक कारण बताता हूँ .
इसका वास्तविक कारण यह है की आप के माध्यम से किये गए आप ही के कर्म आप के और आप के निर्णय के बीच बाधा बनकर खड़े हो जाते है .
अब आप पूछेंगे की मैं पूरे मन से , पूरे विश्वास से, अच्छी नियत से , खुद और सबके भले के लिए कई बार सही निर्णय लेने की सोचता हूँ पर फिर भी कोई न कोई कारण ऐसा सामने आ जाता है की मुझे खुद को यह लगता है की बहुत अच्छा हुआ की मेने अभी यह अमुक निर्णय नहीं लिया .
पर कुछ ही दिनों बाद आप को फिर से मन के इस बहकावे का पता चलता है. और आप फिर से तनाव में आ जाते है .
यह सब क्या हो रहा है आप के साथ ?.
अब मैं पूरी जिम्मेदारी से स्वरुप दर्शन के आधार पर जवाब दे रहा हूँ :
आप के साथ यह सब किसी संयोग या अचानक नहीं हो रहा है . बल्कि पूरे विज्ञानं के सिद्धांतो के आधार पर हो रहा है .
आप ने वैज्ञानिक न्यूटन का नाम सुना होगा . इस महान वैज्ञानिक ने बहुत समय पहले यह कह दिया था की यदि कोई पदार्थ किसी एक दिशा में गति कर रहा है और इस पदार्थ पर यदि कोई भी बाहरी बल इसकी वर्तमान गति के विरुद्ध नहीं लगे तो यह पदार्थ इसी वेग और इसी दिशा में गति अनंत समय तक करता ही रहेगा . यहां आप के लिए यह पदार्थ आप का विचार है जिसे आप परमात्मा से लगातार प्राप्त हो रही प्राण शक्ति से पोषित कर रहे है . और ऐसा करने से यह विचार ही आप के सामने साकार रूप में प्रकट हो जाता है .
अब आप ही बताइये की यदि आप के सामने कोई इंसान खड़ा हो और मैं कहु की आप इसे यह समझो की आप के सामने कोई नहीं खड़ा है . क्या आप यह कर सकते हो ?.
एकदम से नहीं . इसमें मन को देखने की तपस्या लगती है . इसी देखने की क्रिया को मैं स्वरुप दर्शन कहता हूँ .
अब आप को यहाँ यह देखने की जरुरत है की वह पदार्थ आप भी हो और मैं भी और इस ब्रह्माण्ड का हर एक कण . पर परमात्मा ने जो संसार रचा है वह इस प्रकार से रचा है की एक पदार्थ दूसरे से किसी भी रूप में भिन्न होता है . गहराई में देखोगे तो यह भिन्न रूप ही मन होता है .
अर्थात परमात्मा और मन दो अलग अलग नहीं होते है . बल्कि खुद परमात्मा की शक्ति का यह गुण होता है की वह अपने आप को एक से अनेक रूपों में प्रकट करले .
जैसे मोटे रूप में आप के अनेक रूप है : आप किसी के जवांई हो सकते है , उसी समय आप किसी के गुरु हो सकते है , आप उसी समय एक मरीज के लिए चिकित्सक हो सकते है .
और ठीक इसी प्रकार से जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करेंगे तो आप को यह दिखेगा की नौकरी और व्यवसाय भी आप के मन के दो विचार है .
अब आप को यह तय करना है की किस विचार को आप साकार करे ताकि आप जीवन में हर पल खुश रहे .
अब मैं आप को 'किसी एक निर्णय पर कैसे रुके ?' इस का पूरे विज्ञानं के आधार पर जवाब देने जा रहा हूँ :
इसके लिए केवल एक ही अनिवार्य शर्त है - केवल समर्पण वो भी परमात्मा के समक्ष .
जैसे ही आप अपना तन , मन , धन और शेष सबकुछ परमात्मा को सौप देते है तो पहला चमत्कार यह होता है :
आप के भीतर एक विश्वास का जन्म होता है .
और यह विश्वास ही वह रौशनी है जिसमे आप को आप का लक्ष्य साफ़ साफ़ दिखाई देता है .
यह विश्वास ही यूनिवर्स के साथ तारतम्यता है .
अब आप परमात्मा के साथ एक होकर बहने लगते है .
अब आप को कोई भी बल नहीं लगाना पड़ता है .
क्यों की आप ने एक ऐसा बल लगा दिया है जिससे आप का परमात्मा के समक्ष समर्पण घट चूका है .
और यदि अब आप फिर से मन के बहकावे में आकर किसी भी प्रकार का बल लगाएंगे तो फिर से आप पदार्थ की गति की तरह ही अपनी गति पूरे जीवन बदलते रहेंगे .
और इस प्रकार से परमात्मा की तरफ से आप को जो जीवन उपहार के रूप में मिला है उसे आप यु ही मन के बहकावे में आकर खो देंगे और असली आनंद से चूक जायेंगे .
इसलिए आप के भीतर समर्पण भाव कैसे विकसित हो इसके लिए आप नियमित रूप से स्वरुप दर्शन वेबसाइट पर आये और यहां बताये अनुसार स्वरुप दर्शन का अभ्यास करे .
इस वेबसाइट को ध्यान से देखना और पड़ना ही अपने आप में एक बहुत गहरी तपस्या है .
आप जब यह लेख पड़ते है और यदि आप के मन में किसी भी प्रकार का प्रश्न आये तो कमेंट डालने के लिए स्वरुप दर्शन आप का स्वागत करता है .
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