हस्थमैथुन एक प्रकार की अप्राकृतिक क्रिया होती है . और इसका विचार तभी आता है जब हम हमारे प्रभु से अर्थात खुद से दूर होने लगते है . हस्थमैथुन आप के शरीर की हड्डी के भीतर से भी प्राणों को निकाल कर बाहर फेक देता है .
क्या हस्थमैथुन करना सही है ?
मेरे प्रिय
मित्रों आज हमारे प्रभु हस्थमैथुन का सच्चा विज्ञानं समझा रहे है . इसलिए आप से
विनम्र निवेदन है की आप इस लेख को बहुत ही जागरूकता के साथ पढ़ने का बार बार अभ्यास
करे .
क्यों
की एक ही लेख को बार बार पढ़ने से उसके भीतर छिपे मर्म का ज्ञान होने लगता है .
हस्थमैथुन एक प्रकार की अप्राकृतिक क्रिया होती है . और इसका विचार तभी आता है जब हम हमारे प्रभु से अर्थात खुद से दूर होने लगते है .
हमारा पूरा शरीर
ब्रह्माण्ड में व्याप्त विश्व शक्ति से ही लगातार पोषित हो रहा है . अर्थात हमारा
मन ही हमारे शरीर का निर्माता है . और जैसा हमारा
मन होगा हमारा शरीर भी वैसा ही होगा .
मुनष्य के जन्म के समय ही यह निश्चित हो जाता है की इस मनुष्य का रंग कैसा होगा , इसकी लम्बाई कितनी होगी , इसका वजन कितना होगा इत्यादि .
अर्थात हमे प्रभु ने प्रारब्ध भोगने के लिए तथा खुद को प्राप्त करने के लिए ही यह जन्म दिया है .
इसे
आप ऐसे भी समझ सकते है की यह पूरा जीवन आप ने खुद ने ही चुना है . पर अब आप पिछले
जन्म की स्मृतियाँ तथा इस जन्म की भी अनेक स्मृतियाँ भूल चुके है .
स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास आप को सभी जन्मों की स्मृतियों से रूबरू करा देता है .
इसलिए आप हस्थमैथुन करते नहीं है बल्कि आप का प्रारब्ध आप से यह कार्य करवा लेता है . आप खुद ही सोचे की इस दुनिया में दुखी कौन रहना चाहता है ?.
कोई भी नहीं ?.
हस्थमैथुन
करने से जिस प्रकार एक आम से रस निकाला जाता है और अब वह आम पिचक जाता है , ठीक
इसी प्रकार हमारे शरीर से प्राण कुछ मात्रा में निकल जाते है .
हस्थमैथुन
आप के शरीर की हड्डी के भीतर से भी प्राणों को निकाल कर बाहर फेक देता है .
अर्थात हम एक पल के झूठे मजे के लिए हस्थमैथुन जैसी क्रिया करके अपने प्राणों की भी बलि दे देते है . इसीलिए तो आप ने देखा होगा की इसे करने क़े बाद यातो नींद आने लगती है , या हीन भावना आने लगती है , या कमजोरी महसूस होने लगती है , या शरीर बेहद थकने क़े कारण नींद में चला जाता है .
मतलब
ऐसा करके हम खुद ही हमारी मौत को निमंत्रण दे रहे होते है .
और जिसे अभी इसका एक भी नुक्सान नहीं दिखाई दे रहे है उसे यह समझ लेना चाहिए की अभी उसके प्रारब्ध में पुराने अच्छे कर्मो की शक्ति जमा है . जब धीरे धीरे यह जमा स्टॉक खाली होने लगेगा तो फिर ऐसे इंसान को भी इसके दुष्परिणाम भुगतने ही पड़ेंगे .
और इतना गलत काम करने क़े बाद भी हमे हमारे ऊपर क्रोध नहीं आता है जितना क्रोध यदि हमे कोई गाली निकल दे तब आता है .
अर्थात
हमारा मन हमेशा खुद की गलती स्वीकार करने क़े बजाय दूसरे की गलती को तुरंत पकड़ लेता
है .
ऐसा हमारे कमजोर मनोबल क़े कारण होता है . और हमारा मनोबल कमजोर हस्तमैथुन करने से अवश्य होता है .
हस्तमैथुन करने क़े विचार तब भी आते है जब हम पशुओं से प्राप्त चीजों का सेवन बहुत ही अत्यधिक मात्रा में करते है .
क्यों की हस्तमैथुन एक पशुवृत्ति होती है .
महिलायें
और पुरुष दोनों ही हस्तमैथुन करते है . और दोनों ही हमेशा दुखी और लड़ाई झगड़ा करने
वाली प्रवृति क़े होते है .
जब हस्तमैथुन की आदत बलवान होती जाती है तो फिर धीरे धीरे हस्तमैथुन करने वालो का एक अलग ही समूह बन जाता है . और फिर यह समूह आगे चलकर कई प्रकार क़े अपराधों में पढ़कर अपने बहुत ही सूंदर जीवन की एक लाचार पशु की भांति बलि दे देता है .
इसलिए
अब हमारे जागने का समय आ गया है . और खुद से खुद का यह संकल्प करे की मै आज से
हस्तमैथुन नहीं करूँगा या करुँगी . और जब भी मेरे मन में इसकी इच्छा जाग्रत होगी
तो मै भगवान क़े नाम का जाप करुँगी , किसी की भलाई क़े लिए काम करूँगा , बीमार
बच्चों को अस्पताल में देखने जाऊंगा और वहाँ सेवा दूंगा .
यदि आप ज्यादा गरीष्ठ भोजन खायेंगे और अपनी ऊर्जा को सेवा कार्यो में नहीं लगायेंगे तो फिर इस भोजन से मिलने वाली ऊर्जा आप क़े भीतर कई प्रकार की वासनाओं को जन्म देगी . और फिर आप इस ऊर्जा को सही दिशा नहीं देने क़े कारण हस्तमैथुन जैसे अप्राकृतिक कर्म करने लगेंगे .
अब आगे बात करते है :
पर जब प्रारब्ध इतना बलवान हो की यदि आप इस हस्थमैथुन करने की इच्छा को दबा देते है और इस इच्छा रुपी ऊर्जा को किसी अन्य रूप में भी बदल नहीं पाते है तो फिर यही ऊर्जा शरीर में कई प्रकार के विस्फोट पैदा करती है .
जिससे आप को बेचैनी , घबराहट , किसी अंग में दर्द , डर , चिंता इत्यादि अनेक प्रकार की अनुभूतियाँ महसूस होने लगती है .
इसलिए
यदि आप इन अनुभूतियों को सहन नहीं कर पाते है तो आप का मन अपनी सुरक्षा के लिए आप
से हस्थमैथुन करवा लेता है .
अब यह आप के प्रारब्ध पर निर्भर करता है आप की हस्थमैथुन करने की इच्छा कितनी मजबूत है .
पर जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप हस्थमैथुन क्रिया को पूरी तरह जाग्रत होते हुए वास्तविक रूप में समझने लगते है .
अब आप को धीरे धीरे वह उपाय सूझने लगता है जिसके करने पर आप हस्तमैथुन की आदत से हमेशा की लिए मुक्त होने लगते है .
उत्तेजक
भोज्य पदार्थो , अश्लील दृश्यों , अश्लील
बातों, अश्लील गंध इत्यादि से हस्थमैथुन करने की आदत
को बल मिलता है .
इसलिए जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को यह ज्ञान होने लगता है की आप का प्रारब्ध कैसे बदला जा सकता है .
क्यों की अब आप जाग्रत होने लगते है . इसलिए स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते हुए जब आप हस्तमैथुन करने की सोचते है तो आप को इसके दुष्परिणाम भी सामने दिखने लगते है .
पर यह सब परिवर्तन धीरे धीरे शुरू होते है .
स्वरुप
दर्शन क्रिया क़े अभ्यास से आप जीवों को उनके मूल स्वरुप में देखने लगते है .
जैसे यदि आप किसी महिला को देखते है तो अब आप को उसमे अश्लीलता की जगह ईश्वर की अलौकिक सुंदरता नज़र आने लगती है .
ठीक इसी प्रकार से जब कोई महिला किसी पुरुष को देखती है तो उस पुरुष में इस महिला को ईश्वर क़े दिव्य गुण दिखाई देने लगते है .
अर्थात
आप हस्तमैथुन तभी करते है जब आप की शारीरिक इन्द्रियाँ अज्ञानता से निर्मित हुयी
होती है .
मतलब
आप खुद को भौतिक शरीर मान लेते है . और इसी की अनुभूति में रहते है .
पर जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को धीरे धीरे हस्तमैथुन प्रारब्ध से मुक्ति मिलने लगती है और आप क़े इन प्रारब्धों की ऊर्जा आप खुद ही रचनात्मक कार्यो में बदलने में सक्षम होने लगते हो .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
Comments (0)
Login to comment.
Share this post: