काम की शिक्षा जमीन से जुड़ने पर मिलती है . अपने भावों को निर्मल करने से मिलती है . कहाँ खो गए वे दिन जब हम कई कीलोमीटर दूर स्थित स्कूल में पैदल ही अपनी मस्ती में चलकर पढ़ने जाते थे . मतलब यदि मेरा सपना कलेक्टर बनने का था और मै मेरी खुद की गलतियों के कारण यदि कलेक्टर नहीं बन पाया तो अब मै मेरे बच्चे को रोज कलेक्टर बनने के इंजेक्शन की हाई डोज दे रहा हूँ .
काम की शिक्षा
आज के समय में हर माता पिता अपने बच्चे को बढ़िया से बढ़िया शिक्षा दिलाने के लिए रात दिन काम में जुटे हुए है . और ठीक इसी प्रकार से आज के विद्यालय भी छात्रों को बढ़िया से बढ़िया शिक्षा देने के लिए एक से बढ़कर एक आधुनिक तरीके खोज रहे है . अर्थात काम की शिक्षा नहीं मिल पा रही है .
पर फिर भी ना तो माता पिता को वो ख़ुशी मिल रही है जो उन्हें बचपन में सर्दी के लड्डू खाने में मिलती थी . और ना ही आज के बच्चो को वो ख़ुशी मिल रही है जो हम बचपन में एक पाटी और एक पेंसिल लेकर पढ़ने जाते थे .
कहाँ खो गए वे दिन जब हम कई कीलोमीटर दूर स्थित स्कूल में पैदल ही अपनी मस्ती में चलकर पढ़ने जाते थे .
हम तो कभी स्कूल पेंट पहनकर भी नहीं गए . निकर में ही उच्च प्राथमिक तक की शिक्षा ग्रहण कर ली थी .
और जब हम पढ़ाई का काम पूरा नहीं करके लेकर जाते थे तो हमारी हिम्मत नहीं होती थी की हम अध्यापक से नज़र मिला ले . हमे तो डंडे के नाम से ही धूजणी छूटती थी .
फिर तब तो हम अवसाद में नहीं गए . आज ऐसा क्या हो गया है की बच्चे को अध्यापक थोड़ा सा भी उसके भले के लिए डाट दे तो तुरंत बच्चे के माता पिता बच्चे का पक्ष लेने पहुंच जाते है .
और अब तो सरकार ने भी यह नियम लगा दिया है की अध्यापक बच्चो की पिटाई नहीं कर सकते है .
हमारे समय में हम स्कूल में कमरे कम होने के कारण आसपास के पेड़ो के निचे बैठकर पढ़ाई किया करते थे .
उस समय सप्ताह में एक बार अंताक्षरी होती थी . और नैतिक शिक्षा की एक किताब भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित थी .
हमारे समय की शिक्षा एक दूसरे को जोड़ती थी जिसमे सेवा भाव था .
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर बहुत ही बढ़िया देश भक्ति कार्यक्रम होते थे . और फिर शाम को सभी छात्रों को जीमण के लिए अध्यापक जहाँ से न्योता मिला है वहाँ लेकर जाते थे .
उपरोक्त देशभक्ति कार्योक्रमों के लिए स्कूलों में तैयारियां करीब महीने भर पहले शुरू हो जाती थी .
आज लगभग सभी माता पिता और स्कूल नंबर की दौड़ में इस कदर एक दूसरे में फस गए है की छोटे छोटे बच्चे पैरो के निचे कुचले जा रहे है .
अर्थात माता पिता और अध्यापक अपने बराबर वालो को तो जीत नहीं पा रहे है और इन बच्चो को बड़े बड़े पदों का प्रलोभन देकर सूली पर चढ़ा रहे है .
मतलब यदि मेरा सपना कलेक्टर बनने का था और मै मेरी खुद की गलतियों के कारण यदि कलेक्टर नहीं बन पाया तो अब मै मेरे बच्चे को रोज कलेक्टर बनने के इंजेक्शन की हाई डोज दे रहा हूँ .
अब बच्चा तो कच्ची मिट्टी का घड़ा होता है . इसको जैसा हम चाहे वैसा आकार दे सकते है . पर कभी हमने इस मिट्टी को आकार देने से पहले निश्वार्थ प्रेम किया ?
कभी नहीं किया ?
हमेशा अपने बच्चे को एक पैसे कमाने की मशीन की तरह समझा . कभी हमने खुद को और अपने बच्चो को परमात्मा के हवाले कर के देखा ?
कभी नहीं देखा ?
क्यों की जैसे ही हम खुद को और अपने बच्चो को प्रभु के हवाले करके देखते है तो हमे डर लगता है .
और डर भी कोई सामान्य नहीं .
बल्कि मरने का डर लगता है .
जबकि यह पूर्ण रूप से शत प्रतिशत झूठ है . जब तक हम खुद को प्रभु के आगे समर्पण नहीं करेंगे तब तक हमे काम की शिक्षा कभी नहीं मिल सकती है . फिर चाहे हम मेरिट पर मेरिट में आते रहे . क्यों की असली मेरिट का पैमाना हमारे मन की शांति होती है .
और मै यहाँ बच्चो का पक्ष नहीं ले रहा हूँ . की बच्चे दूध के धुले हुए है . यहाँ गलती किसी की नहीं है . ऐसा युग के प्रभाव के कारण हो रहा है . अर्थात यह समय चक्र का प्रभाव है .
और भगवान ने इस युग के प्रभाव से बचने का उपाय पहले ही बता दिया है .
अब आप खुद ही गौर करे की जब आप बहुत परेशान होते है तो अपने मन को खुश करने के लिए कभी घूमने जाते है , तो कभी बाहर खाना खाने निकल जाते है . या फिर कोई अन्य उपाय आजमाते है .
पर यदि आप एक बार मेरे कहने से थोड़ा रुककर इन स्वरुप दर्शन के लेखों को बहुत ही ध्यान से पढ़ने की हिम्मत कर ले तो आप हमेशा के लिए हर परिस्थिति में खुश रहने लग जायेंगे .
अब प्रभु हमे हमारे बचपन में लेकर चल रहे है :
वे बच्चे हम ही थे जो कभी एक रूपये की बीस टॉफी खरीद कर खाते थे और बिना बिजली के भी गर्मी के मौसम में गहरी नींद लेते थे .
फिर ऐसा क्या हुआ की आज हमारे को ऐरकण्डीशनर (ac) में भी नींद नहीं आ रही है .
ऐसा हमारे मन के कारण हुआ है . हम बेहोशी में जीकर हमने खुद ने ही हमारी ऐसी हालत कर ली है .
हम खुद ही इसके लिए शत प्रतिशत जिम्मेदार है .
हम कभी सच्चे मन से प्रभु का आभार ही नहीं करते है की आज उनकी बदौलत ही हम यह श्वास ले पा रहे है .
हमें हमारे बच्चो में प्रभु का रूप देखने का अभ्यास करना है . और बच्चा यदि किसी ऐसी चीज के लिए जिद्द करे जिससे सत्य और अहिंसा का मार्ग बाधित होता है तो फिर बच्चे को बहुत ही प्यार से समझाने का प्रयास करे .
यदि हमारे बहुत प्रयास करने के बाद भी बच्चा हमारी बात नहीं मानता है तो फिर प्रयास करना पूरी तरह बंद करके खुद को और बच्चे को प्रभु के हवाले छोड़ दे .
आप और मै यदि किसी को इस संसार में बदलने लगेंगे तो हम अपनी शांति को खो देंगे . इसलिए हमे उन पुराने दिनों को याद करते हुए आज के इस वर्तमान जीवन को सबसे पहले खुद के लिए ठीक करे .
अर्थात यदि हमारा बच्चा परीक्षा में फ़ैल भी हो जाता है तो उसे इतना प्रोत्साहित करे की उसे भीतर से यह कभी नहीं लगना चाहिए की वह अन्य बच्चो से कमजोर है .
आप के बच्चे में भी उतने ही गुण है जितने किसी मेरिट में आने वाले बच्चे में .
क्यों की हर बच्चा ईश्वर की संतान है . इसलिए ईश्वर में विध्यमान सभी शक्तियाँ आप के बच्चे में भी विराजमान है .
इसलिए अब समय आ गया है की हम सभी को इस भागदौड़ से बाहर निकलकर हमारे दैनिक जीवन के लिए केवल आवश्यक चीजों की पूर्ति करने के लिए ही अपने इस कीमती समय का सदुपयोग करना है .
बाकी समय सेवा कार्यो के लिए निकालना बहुत ही जरुरी है .
सेवा का मतलब खुद के मन को शांत करना होता है . और खुद का मन काम की शिक्षा से ही शांत हो पाता है .
काम की शिक्षा यह होती है की जब आप भीतर से संतुष्ट रहने लग जाए . आप किसी को पीछे छोड़कर कभी भी खुश नहीं रह सकते हो .
बल्कि आप किसी की ख़ुशी के लिए हारकर भी दौड़ में आगे निकल जाते हो .
जैसे आप का बच्चा मोबाइल बहुत ज्यादा देखता है और अब उसकी संगति भी ऐसे दोस्तों के साथ होने लग गयी है जो आप के बच्चे को भी बिगाड़ रहे है .
इसका स्थायी समाधान केवल और केवल स्वरुप दर्शन का अभ्यास करना है . और यह अभ्यास आप केवल समर्पण भाव से ही सीख सकते है .
अर्थात पहले आप को खाली होना पड़ेगा . फिर प्रभु आप के भीतर से प्रकट होंगे . धीरे धीरे आप को बच्चे बहुत ही प्रिय लगने लगेंगे .
वे आप की बाते मानने लगेंगे . क्यों की जब हमारा प्रभाव खुद पर ही नहीं पड़ रहा है तो फिर बच्चो पर कैसे पड़ेगा .
काम की शिक्षा जमीन से जुड़ने पर मिलती है . अपने भावों को निर्मल करने से मिलती है .
काम की शिक्षा जरुरी सुविधा में रहकर जीने से मिलती है ना की अत्यधिक सुविधाओं में और बहुत खराब हालात में .
हमें प्रकृति के संसाधनों का उपयोग हमारे जीवन के संतुलन के लिए करना चाहिए . इसलिए यदि आप एक स्कूल मालिक है तो आप को पहले एक बच्चा बनना पड़ेगा . और स्कूल बाजार की अंधी दौड़ से अपना ध्यान हटाकर अपने खुद के स्कूल में ही एकाग्र होना पड़ेगा .
फिर यदि कोई दूसरा स्कूल का मालिक आप से अपने स्कूल में मिलने आता है तो उसका बड़े उत्साह से स्वागत करना पड़ेगा . तब कही जाकर आप बच्चो को काम की शिक्षा दे पाएंगे .
अर्थात केवल मित्रता का भाव ही काम की शिक्षा है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
Comments (0)
Login to comment.
Share this post: