Imaginary Enemies: Childhood Fears Revisited

बचपन में हमारी कल्पनाशक्ति जितनी तेज़ दौड़ती थी, उतनी ही तेजी से हमारे डर भी। हमारे दिमाग़ में हर परछाईं, हर आवाज़, हर काला कोना… एक संभावित दुश्मन था। और मज़े की बात? बड़े होकर हमें एहसास होता है कि ये “दुश्मन” ज़्यादातर हमारी कल्पना की ही देन थे।

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