गुरुपुरब क्यों मनाया जाता है?

यह त्योहार केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि मानवता, समानता, भाईचारे और सेवा के संदेश को फैलाने का माध्यम है। गुरुपुरब के अवसर पर सिख समुदाय के लोग गुरुद्वारों में इकट्ठा होते हैं, कीर्तन करते हैं, लंगर छकते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ करते हैं।

गुरुपुरब सिख धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - 'गुरु' और 'पुरब'। 'गुरु' का अर्थ है आध्यात्मिक मार्गदर्शक और 'पुरब' का अर्थ है जन्मदिन या उत्सव। गुरुपुरब सिख गुरुओं के जन्मदिन, शहादत दिवस और अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

सबसे प्रमुख गुरुपुरब गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व है, जो कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसके अलावा गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्मदिवस और गुरु अर्जन देव जी तथा गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के दिन भी गुरुपुरब के रूप में मनाए जाते हैं।

यह त्योहार केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि मानवता, समानता, भाईचारे और सेवा के संदेश को फैलाने का माध्यम है। गुरुपुरब के अवसर पर सिख समुदाय के लोग गुरुद्वारों में इकट्ठा होते हैं, कीर्तन करते हैं, लंगर छकते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ करते हैं।

गुरु नानक देव जी: सिख धर्म के संस्थापक

जन्म और परिवार

गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल 1469 को तलवंडी (अब ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता का नाम कल्याणचंद मेहता (जिन्हें मेहता कालू के नाम से भी जाना जाता है) था और माता का नाम तृप्ता देवी था। यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि गुरु नानक देव जी का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था। उनके पिता एक पटवारी थे और खत्री समुदाय से संबंध रखते थे।

नानक जी की एक बड़ी बहन थी जिनका नाम नानकी था। नानकी अपने भाई से बहुत स्नेह करती थीं और उनकी आध्यात्मिक प्रतिभा को पहचानने वाली पहली व्यक्ति थीं।

बचपन की दिव्यता

बचपन से ही नानक जी में असाधारण गुण दिखाई देने लगे थे। वे सांसारिक विषयों में कम रुचि रखते थे और ईश्वर की भक्ति में लीन रहते थे। एक बार जब उन्हें व्यापार के लिए पैसे दिए गए, तो उन्होंने उन पैसों से भूखे साधुओं को भोजन करवाया। जब पिता ने इसकी शिकायत की, तो नानक जी ने कहा कि यही सच्चा सौदा था।

विवाह और परिवार

सोलह वर्ष की आयु में उनका विवाह सुलखनी देवी से हुआ। उनके दो पुत्र हुए - श्री चंद और लखमी दास। हालांकि विवाहित होने के बाद भी वे सांसारिक मोह-माया से दूर रहे और आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रवृत्त रहे।

दिव्य अनुभव

एक दिन नानक जी बेई नदी में स्नान करने गए और तीन दिन तक लापता रहे। जब वे वापस आए, तो उन्होंने कहा, "न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान।" उन्हें दिव्य अनुभव हुआ था और उन्हें ईश्वर से संदेश मिला था कि सभी मनुष्य समान हैं।

उदासियाँ (यात्राएं)

गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन में चार बड़ी यात्राएं की, जिन्हें उदासी कहा जाता है। उन्होंने लगभग 28 वर्षों तक भारत, तिब्बत, श्रीलंका, बांग्लादेश, मक्का, मदीना और बगदाद की यात्रा की। उनके साथ मरदाना नामक एक रबाब वादक थे, जो मुस्लिम थे। यह भी उनकी सर्वधर्म समभाव की भावना को दर्शाता है।

इन यात्राओं के दौरान उन्होंने विभिन्न धर्मों के लोगों से मुलाकात की और सभी को एक ईश्वर की उपासना का संदेश दिया। उन्होंने जाति-पाति, ऊंच-नीच के भेदभाव का विरोध किया और कहा कि सभी मनुष्य परमात्मा की संतान हैं।

गुरु नानक की शिक्षाएं

गुरु नानक देव जी ने तीन मूल सिद्धांत दिए:

  1. नाम जपो - ईश्वर के नाम का स्मरण करो
  2. किरत करो - ईमानदारी से मेहनत करो
  3. वंड छको - अपनी कमाई में से जरूरतमंदों को बांटो

उन्होंने 'इक ओंकार' का उपदेश दिया, जिसका अर्थ है कि ईश्वर एक है। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब में 974 शब्द और शलोक लिखे।

महाप्रयाण

गुरु नानक देव जी ने 22 सितंबर 1539 को करतारपुर (अब पाकिस्तान में) में अपना शरीर त्याग दिया। मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य लहणा को अपना उत्तराधिकारी बनाया, जो गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।

दस सिख गुरुओं का पूर्ण इतिहास

1. गुरु नानक देव जी (1469-1539)

जैसा कि ऊपर विस्तार से बताया गया है, गुरु नानक देव जी सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु थे। उन्होंने मानवता, समानता और एक ईश्वर की उपासना का संदेश दिया।

योगदान:

  • सिख धर्म की नींव रखी
  • लंगर प्रथा की शुरुआत की
  • संगत (सामूहिक प्रार्थना) और पंगत (एक साथ बैठकर भोजन) की परंपरा शुरू की
  • जपजी साहिब की रचना की, जो सिख धर्म का सबसे महत्वपूर्ण प्रार्थना पाठ है

2. गुरु अंगद देव जी (1504-1552)

गुरु अंगद देव जी का जन्म नाम लहणा था। वे मत्ते दी सराय (अब खडूर साहिब, पंजाब) में रहते थे। पहले वे देवी दुर्गा के भक्त थे, लेकिन गुरु नानक देव जी से मिलने के बाद उनके शिष्य बन गए।

योगदान:

  • गुरुमुखी लिपि का विकास और प्रचार किया, जो आज पंजाबी भाषा की लिपि है
  • गुरु नानक देव जी की वाणी को संकलित किया
  • शारीरिक व्यायाम को बढ़ावा दिया और 'मलयुद्ध' (कुश्ती) को प्रोत्साहित किया
  • लंगर परंपरा को और मजबूत किया
  • बच्चों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया

गुरुकाल: 1539-1552 (13 वर्ष)

3. गुरु अमर दास जी (1479-1574)

गुरु अमर दास जी का जन्म बसर्के गिलां गांव में हुआ था। वे 61 वर्ष की आयु में गुरु अंगद देव जी के शिष्य बने और 73 वर्ष की आयु में तीसरे गुरु बने।

योगदान:

  • आनंद कारज (सिख विवाह समारोह) की शुरुआत की
  • सती प्रथा और पर्दा प्रथा का विरोध किया
  • महिलाओं को समान अधिकार दिए
  • लंगर में पहले बैठकर खाने की अनिवार्य प्रथा शुरू की - 'पहले पंगत, फिर संगत'
  • गोइंदवाल शहर की स्थापना की
  • 22 मंजियां (प्रचार केंद्र) बनाए और उनमें से कई की प्रमुख महिलाओं को बनाया
  • 907 शब्द गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं

गुरुकाल: 1552-1574 (22 वर्ष)

4. गुरु राम दास जी (1534-1581)

गुरु राम दास जी का जन्म नाम जेठा था। वे एक गरीब परिवार से थे और उबले चने बेचकर अपना जीवन यापन करते थे। उनकी सेवाभाव और समर्पण के कारण गुरु अमर दास जी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया और अपनी बेटी बीबी भानी से उनका विवाह करवाया।

योगदान:

  • अमृतसर शहर की स्थापना की
  • अमृत सरोवर का निर्माण शुरू करवाया
  • लावां (विवाह के चार फेरे) की रचना की, जो सिख विवाह का अभिन्न अंग है
  • मसंद प्रथा की शुरुआत की, जो धार्मिक प्रचारक थे
  • 679 शब्द गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं

गुरुकाल: 1574-1581 (7 वर्ष)

5. गुरु अर्जन देव जी (1563-1606) - पहले शहीद गुरु

गुरु अर्जन देव जी गुरु राम दास जी के सबसे छोटे पुत्र थे। वे सिख धर्म के पहले शहीद गुरु थे और उनकी शहादत ने सिख इतिहास में एक नया मोड़ दिया।

योगदान:

  • श्री गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन किया (1604 में)
  • हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) का निर्माण करवाया
  • तरनतारन और करतारपुर शहरों की स्थापना की
  • 2,218 शब्द गुरु ग्रंथ साहिब में लिखे, जो सबसे अधिक है
  • सुखमनी साहिब की रचना की

शहादत: मुगल सम्राट जहांगीर ने गुरु अर्जन देव जी को गिरफ्तार करवा लिया क्योंकि उन्होंने राजकुमार खुसरो (जहांगीर के विद्रोही बेटे) को आशीर्वाद दिया था और गुरु ग्रंथ साहिब में इस्लामिक विचारों के खिलाफ कुछ पंक्तियां थीं।

गुरु जी को भयंकर यातनाएं दी गईं:

  • तपती गर्मी में गर्म रेत पर बैठाया गया
  • खौलते पानी में बैठाया गया
  • गर्म तवे पर बैठाया गया और ऊपर से गर्म रेत डाली गई

30 मई 1606 को उन्होंने रावी नदी में स्नान करने की इजाजत मांगी और नदी में उतरते ही अंतर्ध्यान हो गए। यह सिख इतिहास की पहली शहादत थी।

गुरुकाल: 1581-1606 (25 वर्ष)

6. गुरु हरगोबिंद साहिब जी (1595-1644)

गुरु अर्जन देव जी की शहादत के बाद उनके पुत्र हरगोबिंद जी ने 11 वर्ष की आयु में गुरुगद्दी संभाली। उन्होंने सिख समुदाय को एक नई दिशा दी।

योगदान:

  • 'मीरी-पीरी' (सांसारिक और आध्यात्मिक शक्ति) का सिद्धांत दिया
  • दो तलवारें धारण कीं - एक आध्यात्मिक और एक सांसारिक शक्ति का प्रतीक
  • अकाल तख्त साहिब (अमृतसर) की स्थापना की
  • सिख सेना का गठन किया
  • मुगल सेनाओं से कई युद्ध लड़े और जीते
  • किरतपुर शहर की स्थापना की

गुरुकाल: 1606-1644 (38 वर्ष)

7. गुरु हर राय साहिब जी (1630-1661)

गुरु हर राय जी गुरु हरगोबिंद जी के पोते थे। वे बहुत ही कोमल स्वभाव के थे और प्रकृति प्रेमी थे।

योगदान:

  • औषधीय पौधों का बगीचा लगवाया और आयुर्वेदिक उपचार को बढ़ावा दिया
  • दाराशिकोह (शाहजहां के बेटे) को मुगल उत्तराधिकार युद्ध में समर्थन दिया
  • शांतिपूर्ण तरीके से सिख धर्म का प्रचार किया
  • मिशनरियों को भारत के विभिन्न हिस्सों में भेजा

गुरुकाल: 1644-1661 (17 वर्ष)

8. गुरु हरकिशन साहिब जी (1656-1664)

गुरु हरकिशन जी सिख इतिहास के सबसे कम उम्र के गुरु थे। वे मात्र 5 वर्ष की आयु में गुरु बने और 8 वर्ष की आयु में चेचक की बीमारी से उनका निधन हो गया।

योगदान:

  • दिल्ली में चेचक और हैजा की महामारी के दौरान लोगों की सेवा की
  • छोटी उम्र में ही असाधारण ज्ञान और चमत्कारिक शक्तियां दिखाईं
  • बाल गुरु के रूप में प्रसिद्ध हुए

अंत: दिल्ली में बीमार लोगों की सेवा करते हुए उन्हें भी चेचक हो गया और 30 मार्च 1664 को उनका निधन हो गया। मरते समय उन्होंने केवल "बाबा बकाले" कहा, जिसका अर्थ था कि अगले गुरु बकाला गांव में मिलेंगे।

गुरुकाल: 1661-1664 (3 वर्ष)

9. गुरु तेग बहादुर साहिब जी (1621-1675) - दूसरे शहीद गुरु

गुरु तेग बहादुर जी गुरु हरगोबिंद जी के सबसे छोटे पुत्र थे। उन्हें 'हिंद दी चादर' (भारत की ढाल) कहा जाता है क्योंकि उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया।

योगदान:

  • आनंदपुर साहिब शहर की स्थापना की
  • 116 शब्द गुरु ग्रंथ साहिब में योगदान दिए
  • असम और बंगाल की यात्रा की और वहां गुरुद्वारे स्थापित किए
  • धर्म और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए खड़े हुए

शहादत: कश्मीरी पंडित मुगल बादशाह औरंगजेब के अत्याचारों से परेशान होकर गुरु तेग बहादुर जी के पास आए। औरंगजेब ने उन्हें जबरन इस्लाम कबूल करने का दबाव बना रखा था। गुरु जी ने कहा कि अगर वे मुझे धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर कर सकें, तो सभी पंडित खुद ही धर्म बदल लेंगे।

गुरु जी को दिल्ली बुलाया गया और उन्हें इस्लाम कबूल करने के लिए कहा गया। उन्होंने साफ मना कर दिया। उनके साथ तीन शिष्य थे - भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला।

यातनाएं:

  • भाई मती दास को आरे से चीरा गया
  • भाई दयाला को उबलते पानी में उबाला गया
  • भाई सती दास को जिंदा जलाया गया

इन यातनाओं को देखने के बाद भी गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म परिवर्तन से इनकार कर दिया। 11 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में उनका सिर काट दिया गया। यह स्थान आज गुरुद्वारा शीश गंज साहिब के नाम से जाना जाता है।

उनके शरीर को भाई जैता जी (रंगरेटा गुरु) ने आनंदपुर साहिब पहुंचाया, जहां गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब बना है।

गुरुकाल: 1664-1675 (11 वर्ष)

10. गुरु गोबिंद सिंह जी (1666-1708) - अंतिम मानव गुरु

गुरु गोबिंद सिंह जी सिख धर्म के दसवें और अंतिम मानव गुरु थे। वे केवल 9 वर्ष के थे जब उनके पिता गुरु तेग बहादुर जी ने शहादत दी।

प्रारंभिक जीवन: गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म पटना साहिब (बिहार) में 22 दिसंबर 1666 को हुआ था। उनकी माता का नाम गुजरी देवी था। वे बचपन से ही वीर और साहसी थे। उन्होंने फारसी, संस्कृत, उर्दू और अन्य भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। वे एक महान योद्धा, विद्वान और कवि थे।

खालसा पंथ की स्थापना (1699): 30 मार्च 1699 को बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। यह सिख इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी।

पांच प्यारे: गुरु जी ने संगत से एक सिर की मांग की। पहले भाई दया राम (दया सिंह) आगे आए। गुरु जी उन्हें तंबू में ले गए और खून लगी तलवार लेकर बाहर आए। फिर चार और लोगों को बुलाया - भाई धर्म दास (धर्म सिंह), भाई मोहकम चंद (मोहकम सिंह), भाई साहिब चंद (साहिब सिंह) और भाई हिम्मत राय (हिम्मत सिंह)।

बाद में पता चला कि गुरु जी ने पांचों की परीक्षा ली थी और उन्हें अमृत छकाया। फिर उन्होंने स्वयं पांच प्यारों से अमृत लिया। इस प्रकार खालसा पंथ की स्थापना हुई।