यदि आप बच्चों से यह कहते है की मोबाइल ज्यादा मत देखों. और बच्चा आप को दिनभर मोबाइल के साथ ही देखता है . तो अब बच्चे के मन में द्वन्द पैदा हो जाता है .
अपने बच्चों को गलत कामों से कैसे बचाये ?
सबसे पहले तो मै आप को यह समझाता हूँ की गलत काम किसे कहते है ?
ऐसा कोई भी काम जो प्रभु के नियम के विरुद्ध होता है . जैसे आप के पास खाने के लिए अनाज और सब्जियाँ है और आप को यह भी पता है की यह भोजन मेरे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है पर आप स्वाद के वश में या आप की पुरानी आदत से लाचार होकर किसी जीव को मारकर खा जाते है जबकि वह जीव भी आप की तरह अभी जीना चाहता है .
कैसे पता करे की वह जीव अभी और जीना चाहता है ?
इसका पता करना बहुत आसान है .
जो आप खुद के लिए नहीं चाहते हो और इसलिए नहीं चाहते हो की आप को सच्ची ख़ुशी चाहिए . तो ऐसे सभी काम आप किसी दूसरे के लिए भी मत चाहो .
अब आप कहेंगे की कई काम मै खुद के लिए नहीं चाहता हूँ पर फिर भी करना पड़ता है . तब क्या करू ?
आप जब एकांत में चिंतन करेंगे तो आप को पता चलेगा की आप आदत के गुलाम है और स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास आप को आदत की गुलामी से मुक्त करता है .
जैसे जगत में मरना कोई नहीं चाहता है पर फिर भी मरना पड़ता है . क्यों की मौत का किया गया कर्म पीछा करता है .
पर जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो यही मौत उत्सव बन जाती है . क्यों की फिर आप को यह अहसास हो जाता है की मृत्यु होती ही नहीं है .
ठीक ऐसे ही आप के बच्चे आप को समझने की कोशिश करते है .
यदि आप बच्चों से यह कहते है की मोबाइल ज्यादा मत देखों. और बच्चा आप को दिनभर मोबाइल के साथ ही देखता है . तो अब बच्चे के मन में द्वन्द पैदा हो जाता है .
बच्चा सोचता है की मेरे माता पिता कह रहे है वह बात सही है या जो काम वे खुद कर रहे है वह सही है .
इसलिए बच्चा भीतर से आप की बातों का विरोध करता है .
और आप को खुद को भी यह पता है की आप मोबाइल ज्यादा देख रहे है . तभी तो आप अपने बच्चों से यह बात कह रहे है . अर्थात अभी आप खुद यह महसूस कर रहे है की आप मोबाइल पर ज्यादा देर समय बिताकर खुश नहीं रहते है .
और आप को यह भी पता रहता है की या तो आप की मजबूरी है या फिर आप ने ऐसी ही आदत बना ली है .
ऐसी स्थितियों में आप को क्या करना चाहिए ताकि आप के बच्चे गलत काम करने से बच जाए ?
आप को स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करना चाहिए .
क्यों की जैसे ही आप यह अभ्यास सच्ची श्रद्धा से शुरू कर देते है तो आप में सकारात्मक रूपांतरण होने लगता है .
आप को यह ज्ञान प्रभु से मिलने लगता है की अब आप अपने बच्चों को गलत कामों से कैसे बचा सकते है .
क्यों की जैसे जैसे आप गलत कामों से बचते जाते है तो आप के बच्चे भी आप को देखकर धीरे धीरे सभी गलत कामों से बचने लगते है .
अर्थात आप शांत होते ही पूरा परिवार शांत रहने लगता है .
इसलिए बच्चों को गलत कामों से बचाने के लिए आप को उनसे सच्चा प्रेम और वह भी निश्वार्थ करना अनिवार्य है .
क्यों की यही एकमात्र उपाय है .
यदि आप बच्चों को सुधारने के लिए उनके साथ प्रेम के बजाय क्रोध से या अन्य कोई अनैतिक डर दिखाकर पेश आते है तो आप बच्चों के धीरे धीरे दुश्मन बनते जाते है .
क्यों की आप खुद यह अंदाजा लगाए की यदि कोई भी व्यक्ति आप को अनैतिक डर दिखाकर या क्रोध से गलत काम करने से रोकता है तो उसका यह तरीका आप को अच्छा नहीं लगता है .
हालांकि हो सकता है की आप को ऐसे अमुक व्यक्ति का तरीका बाद में अच्छा लग जाए जब आप की गलत काम नहीं करने से जान बच गयी हो .
पर इतना हमारा मन इन्तजार कहा करता है ?
इसलिए अपने बच्चों को सबसे पहले बिना शर्त प्रेम करने का नियमित अभ्यास करे .
और ऐसा अभ्यास करने की सामर्थ्य आप के भीतर स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से आने लगती है .
आप के बच्चे आप ही के कर्मो का फल है . अर्थात जिस प्रकार से हमने बचपन में पतंग उड़ाई थी और उस समय हमारे से मांझा और डोर उलझकर गुच्छे हो जाते थे .
फिर हम उन गुच्छों को धीरे धीरे सावधानी पूर्वक सुलझाते थे . तो हम डोर को सुलझा पाने में सफल हो जाते थे .
और यदि हम उस समय जल्दबाजी में इन गुच्छों को सुलझाने की कोशिश करते थे तो डोर के ये गुच्छे नहीं सुलझते थे . और डोर के टुकड़े टुकड़े हो जाते थे . और फिर या तो हम इन टुकड़ो को जोड़कर काम में ले लेते थे . जिसमे गाँठ ही गाँठ लगी हुयी होती थी . और यदि हम रहीश परिवार से है तो फिर नयी डोर खरीद लेते थे .
ठीक इसी प्रकार से आप और आप के बच्चे भी इसी प्रकार से कर्मो के गुच्छों के रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए है .
अब यह आप को तय करना है की आप इन रिश्ते रुपी गुच्छों को कैसे सुलझाना चाहते हो .
यदि आप जबरदस्ती इन रिश्तों को ठीक करने की कोशिश करेंगे तो फिर आप के और बच्चों के रिश्ते के बीच क्रोध की गाँठ , न्याय की गाँठ , समझदारी की गाँठ , ज्ञान की गाँठ , अहंकार की गाँठ ऐसे तमाम प्रकार की गांठे पैदा होने लगेगी और आप धीरे धीरे अपनी मानसिक शांति खोने लगेंगे .
और यदि आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते हुए अपने बच्चों को समझाने का अभ्यास करेंगे तो फिर यही बच्चे आप को सच्चा प्यार करने लगेंगे .
अब यह निर्णय आप के हाथ में है की आप अपने जीवन में क्या चाहते है . क्यों की कर्म फल भोगने के साथ ही आप के पास कर्म करने की शक्ति भी है . जिससे आप संचित कर्म को रूपांतरित कर सकते है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
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