ख़ुशी आती है फिर चली क्यों जाती है ?

क्यों की अभी आप प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जीवन जी रहे है . जैसे आप एक प्रसिद्द रेस्टोरेंट के मालिक है . और हज़ारो लोग आप के रेस्टोरेंट पर यह सोचकर भोजन करने आते है की आप उन्हें शुद्ध और पौष्टिक भोजन खिलायेंगे.

क्यों की अभी आप प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जीवन जी रहे है . जैसे आप एक प्रसिद्द रेस्टोरेंट के मालिक है . और हज़ारो लोग आप के रेस्टोरेंट पर यह सोचकर भोजन करने आते है की आप उन्हें शुद्ध और पौष्टिक भोजन खिलायेंगे.

पर आप खुद के लिए और अपने निजी परिवार के लिए तो कई जगह से अच्छी तरह पता करके शुद्ध प्राकृतिक भोजन की व्येवस्था कर लेते है पर अपने ग्राहकों को आप मिलावटी भोजन खिलाते है .

आप ऐसा निम्न कारणों से कर रहे है :

या तो आप को अभी ब्रह्माण्ड के नियमों का सही से पता नहीं है

या आप ग्राहकों को भी खुद खाते है वैसा ही भोजन खिलाना चाहते है पर उपलब्धता नहीं है

या आप ने अपने बुते से ज्यादा काम फैला लिया है

या आप कम समय मे धनवान बनना चाहते है

या आप को दूसरों के दुःख का अहसास नहीं है

या आप खुद ही इतने दुखी है की आप को ये समझ ही नहीं आ रहा है की आप क्या गलती कर रहे है

या आप अपने प्रारब्ध से इस तरह से जकड़े हुए है की आप चाहकर भी नहीं कर पा रहे है

या आप आत्मा परमात्मा को ही नहीं मानते है

या आप को केवल खुद से मतलब है

या आप किसी मजबूरी या किसी अन्य दबाव के कारण ऐसा काम कर रहे है

इस प्रकार ऐसे अनेक कारण है जिनकी वजह से शुद्ध भोजन भी आप की ऊर्जा को शुद्ध नहीं कर पा रहा है .

इसलिए जब आप खुश होते है तो भगवान के नियमों को भूल जाते है और ख़ुशी के जोश मे फिर कोई गलती कर बैठते है .

जैसे हम जब बहुत खुश होते है तो हमारे भीतर अहंकार प्रबल हो जाता है . और हम जमीन से उड़ने लगते है . उस समय यदि कोई गरीब और साधारण आदमी हम से मिलने आता है तो हम उसको पहचानने से इंकार कर देते है .

उस समय भगवान् भी यह सोचते है की देखो बेटा दो पैसे क्या आ गए मुझे ही भूल गया है . फिर प्रभु हमे जगाने आते है किसी कष्ट के रूप मे .

हमारे प्रभु लगातर हमे जगा रहे है . पर हमारा मन यह कह रहा है की बस एक बार और ....

यह मन होता ही ऐसा है . पूरा दृश्य जगत मन ही है . पर हर पल बदल रहा है .

आप कभी प्रयोग करके देखना की जब आप के मन मे किसी मित्र से मिलने के भाव आये और आप उस समय बहुत ज्यादा खुश हो जाए . तो फिर उससे मिलने जाना , आप को वहाँ स्थिति ठीक इसके विपरीत महसूस होगी .

ऐसा क्यों हुआ ?

क्यों की ऐसा अहसास कराके प्रभु हमे यह सीखा रहे है की जिस ख़ुशी के पीछे आप भाग रहे है वह आप के भीतर से ही प्रकट हो रही है .

तो क्या इसका मतलब आप को किसी के पास जाने की जरुरत नहीं है ?

इसका मतलब यह नहीं है . आप को किसी जरुरी काम या शिष्टाचार भेट के लिए अवश्य अपने परिचित के पास जाना चाहिए .

अपने परिचित के हाल चाल पूछने अवश्य मिलने जाना चाहिए . पर इसमें आप के भाव उसको सुख पहुंचाने के होने चाहिए न की उससे जलन के या किसी अनैतिक कार्य के लिए .

आप को यदि मदद के लिए भी किसी के पास जाना पड़े तो अवश्य जाना चाहिए . पर यदि सामने वाला आप की मदद करने के लिए जानबूझकर भी मना कर देता है तो आप अपने मन मे ऐसे व्यक्ति के लिए भी बुरे भावों को विकसित न होने दे .

क्यों की ऐसा करके यह अमुक इंसान आप के माध्यम से किये गए पुराने कर्मो को काट रहा है .

यदि आप प्रतिरोध करेंगे तो आप फिर से नए कर्म बंधन मे फस जायेंगे .

इसलिए जब आप बहुत खुश हो रहे हो तो भीतर से यह जाग्रति बनाये रखो की यह भी बदल जायेगा .

 

जैसे आप एक चिकित्सक हो और आप के पास एक बहुत बड़ा हॉस्पिटल है . तो आप हमेशा खुश तभी रह पाएंगे जब आप पूरी ईमानदारी से मरीज की चिकित्सा करेंगे .

यदि आप का मकसद मरीज से अधिक पैसे कमाना है तो आप चाहे कुछ भी उपाय कर ले आप को शांति नहीं मिलने वाली है .

आप ने देखा होगा की कई लोग दान पुण्य बहुत करते है पर पूरे जीवन भर दुखी रहते है .

ऐसा क्यों ?

क्यों की दान पुण्य आप किस भाव से कर रहे हो . क्या आप सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चल रहे हो .

जैसे आप को किसी ने कह दिया है की गाय को गुड़ खिलाने से आप के कष्ट दूर हो जायेंगे . अब आप आज ही गुड़ खरीद के गाय को गुड़ खिलाने जाते है . और अब गाय गुड़ नहीं खाना चाहती है . अब आप गाय को जबरदस्ती गुड़ खिलाना चाहते है . इसलिए गाय आप से डरकर भागने लगती है . अब आप भी गाय के पीछे पीछे गुड़ लेकर भागते है .

और अब आप गाय के मुँह में जबरदस्ती गुड़ डालकर घर आ जाते है . और यह सोचते है की अब आप के कष्ट दूर हो जायेंगे .

पर आप के साथ दूसरे ही दिन फिर से कुछ बुरा हो जाता है . और अब आप गाय को भी दोष देने लगते है और उपाय बताने वाले को भी . और इस चक्कर में घर में फिर से लड़ाई झगड़ा शुरू हो जाता है .

 

अब आप यह सोचते है की आखिर गलती कहा हो रही है . आप की गलती यह है की आप खुद के कर्मो को स्वीकार नहीं कर पा रहे है . क्यों की आप का प्रारब्ध इतना बलवान है की वह आप को भगवान् से दूर रख रहा है . जैसे ही आप सच्ची ख़ुशी की तरफ लौटना चाहते है तो इसका मतलब आप अवचेतन मन में छपा हुआ कर्म मिटा रहे होते है और आप की आत्मा को पहचान रहे होते है .

मतलब आप जब खुद के भीतर की सच्चाई को देखने का प्रयास करते है तो आप के माध्यम से किये गए कर्म आप को इस सच्चाई को देखने से रोकते है .

अर्थात आप खुद आत्मा आप के कर्मो की छाया से ढकी हुयी है . इसलिए जब आप लगातार स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को धीरे धीरे खुद की आत्मा का दर्शन होने लगता है और पहली बार आप को ऐसी शांति की अनुभूति होती है जिसे शब्दों में बयान करना असंभव है . पर जैसे ही आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करना आप के प्रारब्ध के प्रभाव के कारण छोड़ देते है तो फिर यही आत्मा रुपी सच्चा सुख आप के मन के झूठे प्रलोभनों के निचे दब जाता है . और इस प्रकार से आप के पास आयी हुयी ख़ुशी फिर चली जाती है .

इसलिए यदि आप किसी भी तरीके से स्वरुप दर्शन क्रिया पर विश्वास कर लेते है और हर परिस्थिति में इसका अभ्यास जारी रखते है तो फिर धीरे धीरे आप स्थायी ख़ुशी को प्राप्त करने लगते है .

धन्यवाद जी . मंगल हो जी .