जैसे हो वैसे ही अच्छे हो – क्योंकि एक साँप जब खरगोश बनने की कोशिश करता है, तो बस फिसलता है और सबको हँसाता है!
साँप बना खरगोश
एक बार की बात है, झूम-झूम जंगल में एक साँप रहता था जिसका नाम था सिज़ल, और उसका सबसे अजीब दोस्त था एक खरगोश जिसका नाम था बनबन।
सिज़ल हमेशा कुछ नया करने की सोचता रहता था। एक दिन उसने बनबन को खेतों में मस्ती से कूदते-फाँदते देखा और बड़ी हसरत से कहा:
"उफ़! ये रेंगना अब पुराना फैशन हो गया है। मैं भी खरगोश की तरह कूदना चाहता हूँ!"
बनबन ने एक गाजर चबाते हुए कहा, "तू? कूदेगा? तेरे तो पैर ही नहीं हैं!"
सिज़ल बोला, “जहाँ इच्छा वहाँ रस्ता!”
अगली सुबह, सिज़ल पत्तों से बने दो बड़े खरगोश के कान पहनकर आया और अपने पेट पर स्प्रिंग (झूलों से चुराई हुई!) बाँध रखी थी।
बनबन उसे देखता ही रह गया। “ये क्या... जंगल का नया जोकर आया है क्या?”
“मैं अब स्नेबिट हूँ!” सिज़ल गर्व से बोला। “साँप + रैबिट = Snabbit!”
सिज़ल एक पत्थर पर चढ़ा, झूले की तरह उछला… नीचे लुढ़का, फिर एक लकड़ी से टकराया और आखिर में सीधे कीचड़ के तालाब में जा गिरा — धप्प!
पास से जा रहा कछुआ बोला, "वाह भाई, तू तो पूरा जलेबी एक्सप्रेस है!"
बनबन तो हँसी रोक ही नहीं पाया। “तू तो पूरी झूलेवाली मैगी बन गया!”
लेकिन सिज़ल कहाँ मानने वाला था? अगले दिन वो गुब्बारों के पंख पहनकर आया और खुद को बोला — “हॉप-अ-डूडल-सर्पेंट!” और इस बार वो उड़ते-उड़ते सीधे पेड़ में फँस गया।
चिड़ियों ने शिकायत कर दी: "हवा में साँप? ये कौन सा मौसम आया है?"
आखिरकार बनबन बोला, “अरे यार, तू साँप ही बना रह। तू पेड़ों पर चढ़ने में उस्ताद है, रेंगने में मस्त है, और बिना आवाज़ के गाजर चुराने में चैंपियन है!”
सिज़ल ने पेड़ से लटकते-लटकते सोचा… “हम्म, खरगोश बनने के चक्कर में मेरी तो चटनी ही बन गई!”
दोनों ने हँसी-मज़ाक किया और पेड़ के नीचे बैठकर गाजर-बेरी स्मूदी पी। सिज़ल ने वादा किया कि अब वो कभी भी खरगोश के कान नहीं पहनेगा… सिवाय हैलोवीन के!
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