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मेरा नाम ऋषि है। मैं राजस्थान के एक छोटे शहर में रहता हूँ। मेरे जीवन में कई साधारण दिन आए, लेकिन एक दिन ऐसा आया जिसने मेरी पूरी ज़िन्दगी बदल दी। वह दिन था परीक्षा का दिन – लेकिन वह सामान्य दिन नहीं था। उस दिन जो हुआ, वह आज भी मेरे सपनों में आकर मुझे डराता है।

🏫 परीक्षा का दिन शुरू होता है

सुबह मैं जल्दी उठ गया था। माँ ने मुझे जगाया और कहा –
“जल्दी करो बेटा, आज बोर्ड की परीक्षा है। देर मत करना।”

मैंने जल्दी-जल्दी नाश्ता किया, बैग उठाया और बस स्टॉप की तरफ चल पड़ा। रास्ते में मुझे सब सामान्य लग रहा था। सड़क पर कुछ बच्चे किताबें पकड़े दौड़ रहे थे। हवा में गर्मी थी, लेकिन परीक्षा की चिंता ने मेरे मन को और भारी बना दिया था।

स्कूल पहुँचा तो देखा कि पूरा वातावरण सामान्य था – बच्चे आपस में बातें कर रहे थे, कुछ घबराए थे, कुछ नकल की बातें कर रहे थे। मैं अपनी कक्षा में बैठ गया।

📖 परीक्षा शुरू, लेकिन कुछ अजीब

जैसे ही परीक्षा शुरू हुई, मैंने प्रश्नपत्र लिया और जवाब लिखना शुरू किया। पहले 15 मिनट सब ठीक चला। फिर अचानक मुझे लगा कि कमरे में अजीब सी गंध आने लगी है। जैसे कोई गीली मिट्टी या जलती लकड़ी की गंध हो। मैंने नाक सिकोड़कर इधर-उधर देखा, लेकिन किसी और ने कुछ महसूस नहीं किया।

फिर मैंने देखा कि मेरे बगल में बैठा विवेक सिर झुकाकर काँप रहा है। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
वह धीरे से बोला – “तुमने… उसे देखा?”

मैं चौंक गया – “किसे?”

उसने सिर हिलाकर कुछ कहा नहीं। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ कोई नहीं था। परंतु मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।

👻 वह अजीब चेहरा

थोड़ी देर बाद, मैंने ऊपर देखा। छत की तरफ, पंखे के पास, मुझे लगा कोई चेहरा दिखा… सफेद, आँखें लाल, जैसे किसी ने खून से रंग दी हो। मैं काँप गया। मैंने आँखें बंद कर लीं। कुछ सेकंड बाद फिर देखा तो वहाँ कुछ नहीं था।

पर अब मेरे हाथ काँप रहे थे। मैं जवाब लिख नहीं पा रहा था। तभी बाहर से बच्चों के चीखने की आवाज आई। पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। परीक्षा सुपरवाइज़र भी बाहर दौड़ गया।

🧟‍♀ भयावह घटना

हम सब धीरे-धीरे बाहर निकले। गलियारे में अफरा-तफरी मच गई थी। कुछ बच्चे रो रहे थे, कुछ बेहोश हो गए थे। सामने खेल मैदान में, एक छात्र जमीन पर पड़ा था – उसका चेहरा बुरी तरह से खरोंचा हुआ था, आँखें खुली हुईं, और हाथों में खून।

लोग कह रहे थे – “यह तो गिर पड़ा होगा!”
लेकिन किसी ने देखा कि उसके पास कोई परछाई जैसी चीज़ थी, जो हवा में लहराकर गायब हो गई।

मैंने विवेक को पकड़ा – “तुमने देखा?”
उसने रोते हुए कहा – “वो… वो चेहरा… वही था! पंखे के पास…”

🚪 कक्षा बंद, स्कूल खाली

इसके बाद पूरे स्कूल में हड़कंप मच गया। परीक्षा रोक दी गई। प्रधानाचार्य ने बच्चों को घर भेज दिया। लेकिन जब मैं बाहर निकला तो सड़क पर सन्नाटा था। कुछ देर पहले तक जो चहल-पहल थी, वह गायब हो चुकी थी।

बस स्टॉप पर भी कोई नहीं था। मुझे अजीब डर लग रहा था। जैसे कोई पीछे-पीछे चल रहा हो। मैंने कई बार मुड़कर देखा। लेकिन कोई नहीं था। फिर भी मेरे कानों में फुसफुसाहट सुनाई देती रही – “लिख… लिख… लिख…”

🕯 रात का डर

उस रात मैं सो नहीं पाया। खिड़की के बाहर अजीब आवाजें आती रहीं। जैसे कोई चल रहा हो। मैं डर के मारे माँ के कमरे में जाकर सो गया।

रात के करीब 2 बजे मुझे लगा कि कोई मेरे बिस्तर के पास खड़ा है। मैंने आँखें खोलकर देखा तो वही चेहरा… वही लाल आँखें… वही खरोंचा हुआ चेहरा!
मैंने चिल्लाना चाहा लेकिन आवाज नहीं निकली। अगले ही पल वह गायब हो गया। मेरी साँसें तेज हो गईं और मैं रोने लगा।

✅ अगला दिन

सुबह स्कूल में बताया गया कि उस छात्र की हालत गंभीर थी लेकिन वह बच गया। डॉक्टरों ने कहा कि शायद उसने खुद गिरकर खुद को घायल कर लिया होगा। पर हम सब जानते थे – वह सामान्य घटना नहीं थी।

उसके बाद मैंने कई बार उसी समय परीक्षा दी… लेकिन कभी वैसा नहीं हुआ। मैं अब भी उस दिन को याद करके डर जाता हूँ। कभी-कभी लगता है कि वह चेहरा मुझे अभी भी देख रहा है।


⚠ निष्कर्ष

यह कहानी हमें बताती है कि कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें विज्ञान भी नहीं समझा पाता। परीक्षा का दिन सिर्फ पढ़ाई और अंक का नहीं होता – कभी-कभी उसमें छुपा होता है एक डर, एक रहस्य… एक ख़ौफ़नाक सच।