शहर ने मुझे सिखाया... यहाँ सपने नहीं, इंसान बिकते हैं।
नीलम का शहर: सपनों की कीमत
नीलम ने ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए अपने गाँव को विदाई दी थी। उसकी आँखों में इंजीनियर बनने के सपने थे, और पूरा गाँव उस पर गर्व करता था। पर शहर पहुँचते ही उसकी मासूमियत धीरे-धीरे खोने लगी। छात्रावास की फीस, किताबों के खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों ने उसे घेर लिया। जब पिता का भेजा हुआ पैसा कम पड़ने लगा, तो उसने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया, पर एक दिन जब उसकी रूममेट तनुजा ने उसे "आसान पैसों" का लालच दिया, तो उसकी जिंदगी की राह ही बदल गई।
पहली बार जब वह मनोज सर के पेंटहाउस में गई, तो उसने सोचा था कि वह सिर्फ एक बच्चे को पढ़ाएगी। पर जब उस 50 साल के आदमी ने उसके बाल पकड़े और कहा, "तुम्हारी पढ़ाई का खर्च मैं उठा लूँगा, बस तुम्हें मेरी कुछ... खास जरूरतें पूरी करनी होंगी," तो नीलम का दिल धड़कना बंद-सा हो गया। उस रात वह जिस पैसे को लेकर घर लौटी, वह उसके हाथों में जलता हुआ कोयला-सा लगा। पर जब उसने फोन पर माँ की कमजोर आवाज में सुना, "बेटी, डॉक्टर ने नई दवाइयाँ लिखी हैं," तो उसने खुद को समझा लिया कि यह सब उसकी मजबूरी है।
धीरे-धीरे नीलम की जिंदगी दो हिस्सों में बँट गई। दिन में वह कॉलेज की मेधावी छात्रा बनकर प्रोफेसरों को प्रभावित करती, और रात होते ही वह शहर के अमीरों के बंगलों में अपनी जवानी बेच आती। पैसों के साथ-साथ उसकी नजरिए भी बदलने लगा। अब वह गुच्ची के बैग और आईफोन की चमक में खोने लगी थी। पर एक रात जब तनुजा ने उसे "वीआईपी पार्टी" में ले जाकर चार लोगों के हवाले कर दिया, तो नीलम को एहसास हुआ कि वह एक ऐसे जाल में फँस चुकी है, जहाँ से निकलना नामुमकिन है। सुबह जब वह टूटे हुए शीशे के सामने खड़ी थी, तो उसकी आँखों में वही नीलम नहीं थी, जो गाँव से सपनों की खातिर निकली थी।
उसी पल फोन की घंटी ने उसकी सुध-बुध लौटाई। फोन पर पिता की रोती हुई आवाज थी, "बेटी, जल्दी आ जा... तेरी माँ..." नीलम का दिल एकदम थम-सा गया। क्या वह वाकई अपनी माँ को एक बार फिर से गले लगा पाएगी? या फिर शहर की यह अंधेरी गलियाँ उसे हमेशा के लिए निगल जाएँगी?
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