मन की चाल में फसने के कई प्रकार के माध्यम होते है . जैसे :पद का लोभ,पैसे का लोभ,किसी चीज के खोने का डर,किसी के प्यार में फस जाना,गरीबी का डर,मरने का डर,बीमारी का डर,धर्म संकट में फसना.
मन की चाल
आज हमारे प्रभु मन की चाल को विस्तार से समझा रहे है . इस संसार जगत में जो भी इंसान हमारे को दिखाई दे रहे है उनमे से कुछ लोगों को छोड़कर बाकी सभी इंसान इस मन की चाल में फसे हुए है .
कैसे ?
जैसे कोई इंसान अपना जीवन शांति प्रिय तरीके से व्यतीत कर रहा है . वह सुबह सही समय पर उठता है .
फिर अपने रोज के खुद के नित्य कर्मो को पूरा करके अपने काम पर चला जाता है . और शाम को जल्दी घर आकर अपने परिवार को समय देता है . अपने आसपास के लोगों को समय देता है .
अर्थात सुबह भक्ति , दिन में शक्ति और शाम को अभिव्यक्ति के साथ अपना जीवन जीता है .
और इस प्रकार से जीवन जीते हुए वह अपने मन को शांत रखता है . और साथ ही उसके संपर्क में आने वाले व्येक्तियों को भी उससे मिलकर शांति की अनुभूति होती है .
और ऐसा सिलसिला कई वर्षो तक चलता है . फिर अचानक प्रभु अपने इस खले में परिवर्तन करते है . और यह जांच करते है की यह अमुक व्यक्ति इस शांत मन के साथ कितना डटा रहता है .
इसीलिए प्रभु मन के माध्यम से इस व्यक्ति के साथ ऐसी परिस्थिति की रचना करते है की अब धीरे धीरे इसके सोचने और समझने की शक्ति बिगड़ने लगती है .
इसे ऐसे दृश्य दिखाये जाते है जिनको देखकर इसका मन बहुत ज्यादा खुश होने लगता है . और कई बार ऐसे दृश्य दिखाये जाते है जिससे इसका मन घबराने लगता है .
अब यदि यह व्यक्ति दोनों ही अवस्था में स्थिर रहता है . अर्थात अब भी यदि यह खुद को और अपने परिवार को और साथ ही अपने संबंधियों को भीतर से उतना ही प्रेम करता है जितना पहले वाली अच्छी परिस्थिति में करता था तो इसका मतलब यह इंसान अभी भी जाग्रत है .
और यदि ऐसा इंसान परिस्थिति के वश में आकर अपने मन की स्थिरता खो देता है तो फिर यह इंसान मन की चाल में फस जाता है .
मन की चाल में फसने के कई प्रकार के माध्यम होते है . जैसे :
- पद का लोभ
- पैसे का लोभ
- किसी चीज के खोने का डर
- किसी के प्यार में फस जाना
- गरीबी का डर
- मरने का डर
- बीमारी का डर
- धर्म संकट में फसना
ऐसे अनेक माध्यमों से इंसान मन की चाल में फस जाता है और वह धीरे धीरे भगवान को भूल जाता है .
फिर भी भगवान ऐसे इंसान को उसकी आत्मा के रूप में बार बार याद दिलाते है की तुम मेरे बच्चे हो और हमेशा सत्य और अहिंसा के मार्ग का ही पालन करो .
तभी तो आप ने देखा होगा की कई बहुत ही पहुंचे हुए संत अंतिम चरण में भी भगवान को पाने से वंचित रह जाते है .
अर्थात जैसे कोई महान व्यक्ति इस संसार में बहुत ही महान कार्य कर रहा है . और पूरी दुनिया उसकी जय जय कार कर रही है . और हम सभी को यह लगने लगता है की अब इस महान व्यक्ति को भगवान के दर्शन अवश्य होंगे .
और फिर अगले ही दिन खबर आती है की इस महान इंसान को तो पुलिस रात को ही उठाकर जेल में दाल दी .
ऐसा कैसे हो गया ?
ऐसा इसलिए होता है की या तो इस इंसान का कोई पुराना कर्म अब फलित हो गया है . अर्थात या तो इस इंसान के मन में पहले के किये गए किसी कर्म के परिणाम की चाल में यह फस गया हो या फिर वर्तमान में इसने कोई ऐसा कर्म कर दिया हो जो हमारे प्रभु से दूरी बढ़ाता हो .
अर्थात प्रभु यह कह रहे है की मन की चाल में फसने में एक पल से भी कम का समय लगता है .
पर यदि आप अपने मन को ही पूर्ण रूप से प्रभु को समर्पित कर दिए हो तो फिर मन की कैसी भी चाल हो मन आप को खुद के वश में नहीं ले सकता है .
मन आप को ऐसे भोजन की तरफ लेकर जायेगा जिसे खाने के बाद आप के विचार बदलने लगेंगे . भगवान से दूरी बढ़ाने की दिशा में बदलने लगेंगे . जैसे आप का मन आप को तेज नमक – मिर्च मशाला वाला भोजन इतना ज्यादा खिला देगा की आप के शरीर का रोम रोम जलने लगेगा और फिर इस आग को शांत करने के लिए कभी आप मीठे की तरफ भागेंगे तो कभी आप पानी की तरफ भागेंगे . और इस प्रकार से आप उटपटांग हरकते करने लगेंगे . अब इन हरकतों के दरमियान आप भगवान् से दूर ही रहेंगे . और इन्ही पलों में आप मन की चाल में फसकर कोई गलत काम कर बैठेंगे .
अब आगे हमारे प्रभु मन की चाल के पीछे छिपे विज्ञानं को समझा रहे है :
इस पूरे ब्रह्माण्ड में ऊर्जा ही विचारों के रूप में एक जाल की तरह व्याप्त है . और हमारा मन इस शरीर के माध्यम से लगातार इन विचारों के जाल के संपर्क में रहता है .
जैसे आप किसी रास्ते से जा रहे है . और आप ने अचानक से देखा की आप का कोई पुराना मित्र जो बहुत गरीब था वह खुद की एक बहुत ही महँगी कार में बैठा था .
अब आप की आँखों ने इस दृश्य को देखकर आपको विचलित करना शुरू कर दिया है .
अर्थात जिस प्रकार से हम किसी भोजन को मुँह के माध्यम से ग्रहण करते है तो इसका मतलब यह होता है की जिन भावो के माध्यम से इस भोजन को तैयार किया गया है उन्ही भावों के अनुरूप इस भोजन में से विचार तरंगे लगातार उत्सर्जित हो रही है .
अर्थात हम ऐसे भोजन के माध्यम से इससे तैयार विचार रुपी अन्न को ही ग्रहण कर रहे होते है .
और जैसे जैसे यह भोजन हमारे पेट में जाता है तो फिर इसमें उपस्थित विचार अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर देते है .
ठीक इसी प्रकार से हमारी आँखे भी आँखों के मन मुताबिक भोजन को लगातार ग्रहण कर रही है .
मतलब भगवान हमे यह समझा रहे है की हमारी आँखे जिस मन से निर्मित हुयी है और लगातार परिवर्तित हो रही है तो यह आँखे ऐसा भोजन ही ग्रहण करेगी जैसा इन आँखों के पीछे लगे मन रुपी निर्माणकर्ता के भीतर किस प्रकार के भाव लगातार विकसित हो रहे है .
आगे भगवान यह समझा रहे है की जब आप का मन इसके माध्यम से रची गयी मन की चाल को ‘मुँह और आँखों से’ भी पूरी नहीं कर पाता है तो फिर यही मन ‘कानों’ का प्रयोग करता है .
अर्थात अब यही मन इस मन की चाल को कानों के माध्यम से पूरी करना चाहता है .
और यदि इसे यहां भी सफलता नहीं मिलती है तो फिर यही मन अपनी अन्य इन्द्रियों का इस्तेमाल करता है .
इस प्रकार से प्रभु के माध्यम से रचा गया यह मन अपनी मन की चाल में हमे (आत्मा) फ़साने के लिए तरह तरह के प्रलोभन देता है .
और साथ ही खुद भगवान हमे इस मन की चाल में फसने से बचने के लिए बार बार चेतावनी देते है .
प्रभु की इस चेतावनी को इस प्रकार से समझे :
जैसे कोई व्यक्ति नशे की लत में पहली बार जब फसता है तो उसके घरवाले उसे समझाते है . उसके रिश्तेदार उसे समझाते है, उसके मित्र उसे समझाते है .
पर इतने लोगों के समझाने के बावजूद भी वह व्यक्ति समझ क्यों नहीं पाता है ?
क्यों की इस व्यक्ति का प्रभु में जो विश्वास होता है उसकी तीव्रता इसके मन के माध्यम से किये जा रहे उस नशे से मिलने वाली झूठी ख़ुशी की तीव्रता से बहुत कम होती है .
अर्थात ऐसे व्यक्ति का मन उसे किसी शराब की दूकान की तरफ एक सो बीस की स्पीड से भगाकर लेकर जा रहा है और इसके पीछे जो इसमें हितेषी बनकर इसे समझाने के लिए दौड़ रहे है उनकी स्पीड दस की है .
अब आप ही बताइये की कोई इंसान एक सो बीस की गति से चल रहा है , तो उसका पीछा करने वाला इंसान दस की स्पीड से किस जन्म में उसे पकड़ पायेगा ?
किसी भी जन्म में नहीं .
ऐसा इस इंसान के साथ क्यों हो रहा है ?
ऐसा इस इंसान के मन के माध्यम से किये गए कर्मो के प्रभाव के कारण हो रहा है .
मन की चाल को केवल मन पर ध्यान रखकर ही समझ सकते है और मन पर ध्यान केवल और केवल भगवान को समर्पण भाव से याद करके , महसूस करके , अपने भावों में उतारकर ही लगा सकते है .
जैसे अचानक से आपने देखा की आप का एक मित्र जो आप से हमेशा अहिंसा की बाते ही करता था अभी एक पशु को मार रहा है और अब आप को यह भी पता चल गया है की आज यह मित्र इसी पशु के मांश को पकाकर खायेगा ?
ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे ?
यदि आप जाग्रत नहीं होंगे तो फिर से आप मन की चाल में फस जायेंगे . और यह जाग्रति एक दिन में नहीं आती है . इसके लिए त्याग और समर्पण भाव की आवश्यकता होती है . अर्थात भगवान में समर्पण भाव का होना एक अनिवार्य शर्त है यदि आप मन की चाल में फसने से बचना चाहते है तो .
और इसके लिए निरंतर स्वरुप दर्शन का अभ्यास करना बहुत ही जरुरी है .
और यदि कोई इंसान ‘स्वरुप दर्शन का अभ्यास करने वाले इंसान को’ मन की चाल में फ़साने का केवल भाव भी रखता है तो वह खुद ही इस मन की चाल में फस जाता है .
अर्थात जैसे किसी के चेहरे पर बहुत से कील मुहांसे है और एक दूसरा व्यक्ति इन कील मुहांसो को देखकर इस व्यक्ति के चेहरे से और इस व्यक्ति से घृणा करता है तो फिर यह प्रकृति का नियम है की कुछ ही समय बाद इस घृणा करने वाले व्यक्ति के चेहरे पर भी कील मुहांसे होना शुरू हो जायेंगे .
अब चाहे यह व्यक्ति कितना भी अच्छा भोजन खाये , अपने शरीर की स्वच्छता का ध्यान रखे , चाहे कील मुहांसो को ठीक करने के लिए महंगी दवाओँ का प्रयोग करे .
जब तक यह व्यक्ति अपने इस घृणा वाले भावों को नहीं बदलेगा तब तक यह व्यक्ति कील मुहांसो की समस्या से मुक्त नहीं होगा .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी.
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