मै कर रहा हूँ या भगवान ?

जब आप को आत्मा परमात्मा की अनुभूति हो जाती है तब आप को यह पता चल जाता है की आप खुद कुछ नहीं कर रहे है , बल्कि आप के रूप में खुद परमात्मा ही सबकुछ कर रहे है .

मेरे प्यारे मित्रों आज आप को आप का अपना मुकेश परमात्मा का वह राज समझाने जा रहा है जिसे यदि आप पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ यदि समझ लेते है तो फिर आप अपने जीवन में हरपल ख़ुशी की अनुभूति महसूस करने लगेंगे .

पहले मुकेश आप को स्वरुप दर्शन क्रिया के बारे में थोड़ा सा समझाना चाहता है :

स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास का मतलब आप जो कुछ भी हरपल महसूस कर रहे है उसे आप केवल परमात्मिक अनुभूति कहते है , स्वीकार करते है , सबकुछ यही है का भाव स्वीकार करते है . अर्थात स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास मतलब आत्मा परमात्मा की अनुभूति का अभ्यास करना होता है .

अब बात करते है की मै कर रहा हूँ या भगवान ?

इसे मै आप को एक उदाहरण से समझाता हूँ :

जैसे हम चार व्यक्ति है और हम एक खेल खेलना चाहते है . पर हम चारों व्यक्ति तभी कुछ खेल सकते है जब हमारा शरीर किसी भी रूप में चलता फिरता हो .

जैसे हम क्रिकेट खेलना चाहते है तो हमारे शरीर में गेंद और बल्ला पकड़ने की शक्ति और ज्ञान होना चाहिए .

अर्थात हम चारों व्यक्ति जिस शक्ति से सभी प्रकार की क्रियाये कर रहे है वह शक्ति परमात्मा कहलाती है . और वह शक्ति कण कण में व्याप्त है .  और मजे की बात यह है की हमारा शरीर और मन भी इसी शक्ति से निर्मित हो रहा है , सुरक्षित रहता है तथा परिवर्तित होता है .

इसलिए मै मुकेश आप से कहता हूँ की हम चारों एक ही परमात्मा से प्रकट हो रहे है . इसलिए हमारे बीच में वास्तविक दूरी शून्य है .

इसी शक्ति में जिस खेल को खेलने का विचार हमारे मन में आ रहा है वह विचार अदृश्य रूप में छिपा हुआ है . अर्थात इसी परमात्मिक शक्ति में सभी विचार छिपे हुए है . जैसे गेहूँ के बीज में गेहूँ का पौधा छिपा हुआ होता है .

पर यह पौधा इस बीज मेसे तभी प्रकट होता है जब हम इसे जमीन में गाड़ते है .

ठीक इसी प्रकार से हम भी आत्मा रुपी बीज है जिससे मन और इस मन से पूरा ब्रह्माण्ड प्रकट हो रहा है . अर्थात आप के भीतर पूरा ब्रह्माण्ड छिपा हुआ है . पर यह प्रकट तभी होता है जब आप खुद के भीतर गड़ते हो . अर्थात अपने स्वरुप का दर्शन करने का अभ्यास करते हो .

स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से आप को यह ज्ञान मिलने लगता है की आप अपने जीवन को जीव भाव को महसूस करते हुए परमात्मा के हुक्म का पालन कर रहे होते हो .

अर्थात सबकुछ परमात्मा के निर्देश से हो रहा है . पर आप को ऐसा लगता है की आप खुद हाथ पैर चला रहे है .

ऐसा क्यों लगता है ?

ऐसा इसलिए लगता है क्यों की आप की आत्मा में वे सभी गुण छिपे हुए है जो परमात्मा में छिपे हुए है . अर्थात वास्तविक सत्य तो यह है की आत्मा और परमात्मा के बीच दूरी शून्य है . मन के माध्यम से जो हम दूरी महसूस करते है यही माया है .

अर्थात हम शरीर नहीं है पर दीखते हम शरीर है . और इस बात की पुष्टि आप ऐसे कर सकते है की जब हमारा कोई प्रियजन मर जाता है तो हम उसके शरीर को या तो दफना देते है या जला देते है . इससे यह सिद्ध होता है की इतने समय से हम उसके शरीर को प्यार नहीं कर रहे थे . बल्कि हम उस की आत्मा को ही प्यार कर रहे थे . तभी तो प्रियजन की मृत्यु के बाद भी हमे उसकी याद आती रहती है .

वरना आप खुद ही अंदाजा लगाइये की किसी के मरने के बाद उसकी याद कैसे आ सकती है . इसका मतलब वह अभी मरा नहीं है . और कभी मरेगा भी नहीं .

वास्तव में हम अमर है . हम अमर आत्मा ही प्रभु की इच्छा से जीव रूप धारण करके खेल खेलती है . मतलब हम सभी जीव वास्तविक रूप में एक दूसरे के सच्चे मित्र है और केवल प्रेम की डोर से हम बंधे हुए है .

पर हमारे पिता भगवान खुद के अनंत ज्ञान का आनंद लेने के लिए हमे अलग अलग किरदार में बांधकर अपनी लीला रचते है .

जब आप को आत्मा परमात्मा की अनुभूति हो जाती है तब आप को यह पता चल जाता है की आप खुद कुछ नहीं कर रहे है , बल्कि आप के रूप में खुद परमात्मा ही सबकुछ कर रहे है .

पर जब हमारे भगवान को हमारे माध्यम से ऐसा खेल खेलना हो जिसमे आप भगवान् को भूलकर अपने जीव भाव में इस कदर डूबकर अपना किरदार निभाना हो तो तब आप को यह लगता है की आप खुद ही भगवान है और सब कुछ आप ही कर रहे है .

इसलिए दोनों बाते सही है . पर कब कोनसी बात सही है और किस आत्मा के लिए सही है यह भगवान के इस खेल की जरुरत पर निर्भर करता है .

अर्थात जैसे किसी एक जीव को उसके किये गए कर्म की सजा देनी है तो जिस अन्य जीव के माध्यम से यदि उसका यह कर्म काटना हो तो उस अन्य जीव को इस सजा भुगतने वाले जीव में दोष नज़र आयेगा.

परमात्मा उस समय सजा देने वाले इंसान के मन से आत्म अनुभूति का ज्ञान भुला देते है .

क्यों की हमारे प्यारे प्रभु यदि सजा देने वाले के मन से आत्म अनुभूति का ज्ञान नहीं भुलायेंगे तो फिर इस इंसान को दोषी में किसी प्रकार का दोष नज़र नहीं आयेगा .

जैसे एक वीतरागी संत के लिए पापी आत्मा और पुण्य आत्मा दोनों समान होती है . वह न तो मारने वाले से द्वेष करता है और न ही धर्म करने वाले से राग.

पर यदि हम चार लोगों के माध्यम से यदि हमारे प्रभु को लीला रचनी है तो फिर हमारे प्रभु हमारे मनो की स्तिथि ऐसी कर देते है जिससे हम प्रभु लीला के माध्यम से मनोरंजन जैसा प्रभु चाहते है वैसा कर सके .

तभी तो आप संसार में देखते की कई बार भाई को भाई मार देता है और कई बार भाई को दुश्मन बचा लेता है .

क्यों की यह सब हमारे कर्मो का हिसाब किताब है . पर जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को यह पता चलने लगता है की अब प्रभु मेरे मन से यह ज्ञान भुला रहे है की यह सामने वाला आत्मा है . और प्रभु मुझे इसे एक दोषी के रूप में दिखा रहे है .

क्यों की अब आप को प्रभु की पूरी पिक्चर साफ़ साफ़ समझ में आने लगती है . इसलिए अब आप प्रभु के हुक्म का पालन करने लगते है . और आप अब सुख दुःख से ऊपर उठने लगते है .

इस प्रकार आप को यह अनुभूति होने लगती है की जैसी दृष्टि वैसी श्रष्टि . अब आप भीतर से सभी जीवों का सम्मान करते है . अब आप उनसे सच्चा प्रेम करने लगते है .

अर्थात स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से आप को सभी जीवों से अपनी एकता की अनुभूति होने लगती है .

इस प्रकार आज मुकेश ने आप को यह समझाया है की सबकुछ आप ही कर रहे है यह बात भी शत प्रतिशत सही है . और सबकुछ परमात्मा ही कर रहे है यह बात भी शत प्रतिशत सही है .

पर किस आत्मा के लिए कोनसा जवाब सही है यह उस आत्मा की जाग्रति पर निर्भर करता है .

धन्यवाद जी . मंगल हो जी .