लैला–मजनूं की अमर प्रेमकथा

यही कहानी है लैला और मजनूं की। यह सिर्फ़ दो लोगों की मोहब्बत नहीं, बल्कि एक ऐसी दास्तान है जो सदियों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है।

कभी–कभी प्रेम इतना गहरा होता है कि वह इंसान को दुनिया से तोड़कर खुदा से जोड़ देता है। यही कहानी है लैला और मजनूं की। यह सिर्फ़ दो लोगों की मोहब्बत नहीं, बल्कि एक ऐसी दास्तान है जो सदियों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है।

अरब की तपती हुई रेत में, बानू आमिर नाम के कबीले में एक लड़का पैदा हुआ जिसका नाम था क़ैस इब्न अल-मुलव्वह। बचपन से ही तेज, बुद्धिमान और खूबसूरत। उसी इलाके में एक लड़की थी, लैला अल-आमिरिया, जो अपनी सुंदरता और मासूमियत के लिए जानी जाती थी। दोनों एक ही मक़तब (स्कूल) में पढ़ते थे। वहीं पहली बार उनकी आँखें मिलीं और वहीँ से एक मासूम दोस्ती की शुरुआत हुई।

धीरे–धीरे यह दोस्ती मोहब्बत में बदलने लगी। क़ैस के लिए लैला दुनिया की सबसे खूबसूरत हकीकत बन गई। जब भी लैला हँसती, क़ैस का दिल जैसे बेकाबू हो जाता। जब भी वह पास आती, उसे दुनिया थम सी जाती।

लेकिन समाज को मासूम मोहब्बत कभी मंज़ूर नहीं रही। जैसे ही परिवार वालों को उनकी नज़दीकी का अंदेशा हुआ, उन्होंने दोनों को अलग कर दिया। अरब की कठोर परंपराओं में यह स्वीकार्य नहीं था कि लड़का–लड़की खुलकर एक–दूसरे से प्रेम करें।

यही वह पल था जब क़ैस का नाम बदलकर “मजनूं” पड़ गया — जिसका अर्थ है दीवाना। लोग उसका मज़ाक उड़ाते थे, उसे ताने देते थे, लेकिन वह सचमुच लैला की मोहब्बत में दीवाना हो चुका था।

मजनूं हर वक्त लैला का नाम जपता। उसके दोस्त, उसके घर वाले, सब उसे समझाने की कोशिश करते, पर मजनूं कहता:
“दिल को बहलाने की बात मत करो, दिल तो वहीं है जहाँ लैला है।”

मजनूं का हाल बुरा होने लगा। उसने कपड़े पहनना छोड़ दिया, खाना–पीना त्याग दिया और रेगिस्तान की रेत में भटकना शुरू कर दिया। उसकी आँखों में बस लैला का चेहरा बस गया था।

उधर लैला भी मजनूं से उतना ही प्यार करती थी। पर एक लड़की होने के नाते वह समाज की जंजीरों से बंधी थी। जब उसके परिवार ने उसकी शादी किसी और से तय कर दी, तो वह चाहकर भी विरोध नहीं कर सकी।

कहते हैं, शादी के दिन लैला की आँखों में आँसू भरे थे। उसने दुल्हन का लिबास जरूर पहना, पर उसके दिल में सिर्फ़ मजनूं का नाम था।

लैला की शादी किसी और से हो गई, लेकिन उसकी रूह कभी उस आदमी की न हो सकी। उसका दिल अब भी मजनूं में ही धड़कता था।

इधर मजनूं को यह खबर लगी तो वह और भी पागल हो गया। उसने खुद को पूरी तरह रेगिस्तान को सौंप दिया। वह जानवरों के साथ रहने लगा, उनसे बातें करता, पेड़–पौधों से अपने दर्द साझा करता। कहते हैं, मजनूं इतना दीवाना हो गया था कि जंगली जानवर भी उसका साथ देने लगे।

कभी–कभी वह पेड़ों की जड़ों पर शायरी लिखता:
“लोग कहते हैं मैं पागल हूँ, पर यह दीवानगी ही मेरी ज़िंदगी है।”

उसकी शायरी दूर–दूर तक मशहूर हो गई। सूफ़ी कवियों ने मजनूं के इश्क़ को इश्क़–ए–हक़ीक़ी यानी सच्चे प्रेम का दर्जा दिया। उनके लिए लैला, खुदा का प्रतीक बन गई और मजनूं एक सच्चे आशिक़ का।

लेकिन लैला की हालत भी कुछ कम बुरी नहीं थी। वह अपने शौहर के घर में रहकर भी हर पल मजनूं को याद करती। उसका शरीर वहाँ था, लेकिन उसकी रूह तो मजनूं के पास भटक रही थी। कहते हैं लैला धीरे–धीरे बीमार पड़ने लगी।

लैला और मजनूं की मुलाकातें छुप–छुपकर होने लगीं। वह दोनों कभी किसी पुराने खंडहर में, कभी रेगिस्तान की सुनसान राहों में एक–दूसरे से मिलते। लेकिन हर मुलाकात अधूरी रहती।

समाज, परंपरा और परिवार की दीवारें उनके बीच खड़ी थीं।

आखिरकार, जब लैला की हालत बेहद खराब हो गई तो उसने दुनिया को अलविदा कह दिया। उसके मरने की खबर सुनते ही मजनूं की दुनिया पूरी तरह बिखर गई। वह दौड़ता हुआ उसकी कब्र पर पहुँचा और ज़मीन पर गिर पड़ा।

कहते हैं, मजनूं ने वहीँ अपनी आखिरी साँस ली।

इस तरह मोहब्बत की यह दास्तान अधूरी होते हुए भी अमर हो गई।

आज भी जब लोग लैला–मजनूं की कहानी सुनते हैं तो उनकी आँखें नम हो जाती हैं। यह सिर्फ़ प्रेम कथा नहीं है, यह उस जुनून की कहानी है जिसमें इंसान खुद को भूलकर अपने महबूब में खुदा को ढूँढने लगता है।

सूफ़ी संत कहते हैं:
“इश्क़ इंसान को मिटा देता है, और मिटाकर खुदा से मिला देता है।”

लैला–मजनूं की कब्र आज भी अरब में मौजूद मानी जाती है। लोग वहाँ जाकर फूल चढ़ाते हैं और दुआएँ माँगते हैं।

फैक्ट यह भी है कि इस कहानी के अलग–अलग रूप अरब, फ़ारस और भारत में पाए जाते हैं। कहीं यह कहानी खुशहाल होती है, तो कहीं बेहद दर्दनाक। पर हर जगह एक बात एक जैसी है — लैला और मजनूं का इश्क़ कभी कमज़ोर नहीं पड़ा।

बॉलीवुड और उर्दू शायरी में भी इस दास्तान को बार–बार दोहराया गया। फ़िल्में बनीं, ग़ज़लें लिखी गईं, कव्वालियाँ गाई गईं। लेकिन हर रूप में यह दास्तान आज भी उतनी ही ताज़ा लगती है।

लैला–मजनूं हमें सिखाते हैं कि सच्चा प्यार किसी चीज़ का मोहताज नहीं होता। न रिश्तों का, न समाज का, न ही दुनिया का। वह तो बस दिलों में जिंदा रहता है।