अब बहुत ही ध्यान देने वाली बात यह है की पुराना बुरा कर्म तो मिट जाता है पर आप का चेतन मन यह जानता है की हां मेने ही मेरी अज्ञानता के कारण ये बुरे कर्म किये थे . पर अब आप खुद आत्मा यह महसूस करती है की वह मेरा भूतकाल था और यह मेरा वर्तमान काल है .
क्या बुरे कर्म भुगतने ही पड़ते है ?
क्या
बुरे कर्म भुगतने ही पड़ते है ?
मेरे प्यारे मित्रों प्रभु अपने इस बहुत ही गहरे रहस्य को मेरे माध्यम से आप तक पंहुचा रहे है .
इसलिए आप से मेरा
विनम्र अनुरोध है की यदि यह लेख आप को एक बार में ठीक से बहुत ही गहराई से समझ में
नहीं आये तो आप इसे तब तक पढ़े जब तक आप को खुद को भीतर से यह अनुभव होने लगे की
हां आप अब स्वरुप दर्शन क्रिया के इन लेखों के माध्यम से हम सभी के अनन्य प्रियतम
परमपिता परमेश्वर से जुड़ रहे है . अर्थात आप खुद के प्राणों से जुड़ रहे है .
- और इसका पैमाना यह है की अब आपका लगातार आत्मविश्वास बढ़ रहा है
- चिंता घट रही है
- लक्ष्य धीरे धीरे स्पष्ट दिखाई दे रहा है
सबसे
पहले बुरा कर्म क्या होता है ?
ऐसी कोई भी क्रिया जिसके करने पर हमारे मन को भीतर से अच्छा नहीं लगता हो .
अब आप ऐसी अनुभूति या तो किसी पुराने किये गए कर्म के परिणाम में अभी वर्तमान में महसूस कर सकते है
या अभी आप जाग्रत होते हुए भी अपने पुराने बलवान प्रारब्ध के कारण किसी काम को करने के दौरान महसूस कर सकते है .
मै इसे आप को ऐसे समझाता हूँ ...
जैसे की अभी आप आधा घंटा ध्यान करके अपने कक्ष से बाहर आये ही है और आप ने ध्यान के दौरान निम्न प्रकार के अभ्यास किये है :
- मुझे अब बहुत अच्छा लग रहा है
- मेरा किसी से कोई बैरभाव नहीं है
- मै सभी से बहुत प्रेम करता हूँ
- मै सभी जीवों को समान भाव से देखता हूँ
- मै क्रोध नहीं करता हूँ
- मै किसी से डरता नहीं हूँ इत्यादि
अब जैसे ही आप
ऐसे ध्यान अभ्यास करके बाहर आये तो आप ने अचानक से एक ऐसे व्यक्ति को अपने सामने
देखा की जिसने बहुत समय पहले आप को गालियाँ दी थी और आप के पैसे अभी तक नहीं लौटाए
थे .
तो यदि आप ने अभी अभी जो स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास किया है वह यदि आप ने बहुत ही दृढ़ विश्वास और सच्ची श्रद्धा से किया है तो इसका मतलब आप की जाग्रति अभी भी बनी हुयी है .
मतलब आप ने इस आधे घंटे के ध्यान अभ्यास
के दौरान अपने मन को इस प्रकार से रूपांतरित किया है की जो आप के मन में किसी भी
इंसान को लेकर जैसे भी भाव थे वे अभी मित्रता के भावों में रूपांतरित होने के क्रम
में है .
अर्थात जैसे जमीन में गड़े हुए गेहूँ में अंकुर फूट रहा हो ताकि वह गेहूँ का बीज अपने पेड़ बनने के लक्ष्य को पूरा कर सके .
मतलब गेहूँ अपना धर्म 'बीज से पौधा' बनने की रचनात्मकता को पूरी भक्ति के साथ निभा रहा है .
ठीक इसी प्रकार से आप भी इस आधे घंटे के स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से अपने अवचेतन मन को नये सिरे से तैयार कर रहे है .
१. अब यदि आप इस इंसान को देखने के बाद भी भीतर से अभ्यास की अवस्था में ही हो अर्थात वर्तमान क्षण में ही हो तो अब आप को इसके ऊपर क्रोध नहीं आएगा . बल्कि आप के साथ निम्न चमत्कार घटित होंगे :
- आप इन्हे देखते ही खुश हो जायेंगे
- अब आप को इसने आप के साथ जो गलत व्यवहार किया था उसका कारण स्पष्ट रूप से समझ में आ जायेगा
- आप के भाव इस इंसान को देखकर निर्मल होने लगेंगे
- आप अब इसे भी खुद की तरह ही अपने प्रियतम की संतान महसूस करने लगेंगे
अर्थात आप के और
इस इंसान के दिलों के बीच दूरी घटती हुयी महसूस होगी
२. यदि आप इस आधे घण्टे के स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास को लगभग ५० प्रतिशत सच्चाई के साथ ही आज किया है तो फिर आप के साथ निम्न चमत्कार घटित होंगे :
- ऐसे इंसान को देखने के बाद आप का थोड़ा मूड खराब होने लगेगा
- आप के अवचेतन मन से अभी भी जमा बाकी प्रारब्ध स्टॉक इस इंसान को देखने से और बाहर आने लगेगा
- जिसके परिणामस्वरुप आप इन्हे यह कह सकते है की आप ने मेरे पैसे अभी तक क्यों नहीं लौटाए
- आप की मेरे घर आने की हिम्मत कैसे हुयी
- आप से मै मेरे पूरे पैसे वसूल करके छोडूंगा
अर्थात ऐसे और भी इससे मिलते झूलते विचार अवचेतन मन से
बाहर आने लगेंगे
३ . यदि आप ने इस आधे घण्टे के अभ्यास को बिलकुल भी ठीक से नहीं किया है तो फिर आप के साथ निम्न चमत्कार घटित होंगे :
- फिर अभी आप का मन शांत अवस्था में नहीं है
- आप अभी भी पुराने ख़यालों में ही जी रहे है
- आप अभी भी अपने प्रारब्ध भोग से बहुत ही गहराई से जकड़े हुए हो
- इसलिए अब आप जैसे ही इस इंसान को देखते है तो तुरंत आप को इस पर गुस्सा आ जायेगा
- आप की पत्नी या आप के पति भी आप का गुस्सा देखकर अपने कमरे से बाहर आ जायेंगे
- और यदि आप का गुस्सा बहुत तेज है तो आप के पड़ोशी भी बाहर आ जायेंगे
मतलब मै आप को यह
समझा रहा हूँ की कैसे आप अपने किसी पुराने किये गए कर्म के सभी प्रकार के प्रभावों
से आप प्रभावित होते है .
यहां
आप का मतलब 'आप आत्मा' से है .
जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को यह पता चलने लगता है की कौनसा कर्म मुझे किधर ले जा रहा है .
जैसे अभी अभी आप के पास कोई फ़ोन आये और सामने वाला आप को यह कहे की आप के लिए एक बहुत बढ़िया नौकरी निकली है .
और आगे कहे की आप को यह नौकरी कल से ही ज्वाइन करनी है .
और आप को वेतन भी आप की सोच से ज्यादा ऑफर किया गया हो .
तो
आप के साथ निम्न घटनाएं घटेगी :
- या तो आप तुरंत स्वीकार कर लेंगे
- या आप यह कहेंगे की मै अभी मेरे घर वालों से राय करूँगा
- या आप कंफ्यूज हो जायेंगे
- या आप चिंता में डूब जायेंगे
मतलब जैसी आप के
अवचेतन मन की स्तिथि अभी वर्तमान में है तथा आप इस स्तिथि के प्रति कितने प्रतिशत
जाग्रत हो इस पर आप का जवाब निर्भर करता है .
इसलिए जैसे जैसे आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप का चेतन मन इस बात के लिए हमेशा तैयार रहता है की मेरे अवचेतन मन में जमा संचित कर्मो में से किसी भी प्रकार का कर्म कभी भी फलित हो सकता है .
जैसे आप ने कई बार खुद के साथ यह होते
हुए देखा होगा की आप घर में या बाहर किसी भी इंसान के साथ दो मिनट पहले बहुत ही
खुश रहते है . उसके साथ सात जन्म बिताने का वादा बहुत ही विश्वास के साथ करते है
और फिर दो मिनट बाद ही यदि यही इंसान आपका कोई बड़ा निजी नुक्सान करदे तो अब आप इसी
इंसान पर बहुत ही गंदे शब्दों की बौछार करने लगते है .
यदि आप को मेरा यह लेख पड़ते हुए आलस आने लगे या फिर नींद आने लगे तो आप से मेरा विनम्र अनुरोध है की आप इसे एकांत में मुँह से बोलकर पढ़े .
क्यों की इससे आप के मुँह की आवाज आप के कानों को सुनायी देती है . और इस आवाज की वजह से आप के कान आप के अवचेतन मन में इन शब्दों से सम्बंधित भावों को अंकित कर देता है .
और आप को यह समझ ही आ गया है की ये भाव आप की चेतना को ऊपर की तरफ उठा रहे है .
इसलिए जब आप की चेतना ही ऊपर उठ जाती है तो आप के अवचेतन मन से पुराने संचित कर्म हमेशा के लिए इन अच्छे कर्मो में रूपांतरित हो जाते है .
अब बहुत ही ध्यान देने वाली बात यह है की पुराना बुरा कर्म तो मिट जाता है पर आप का चेतन मन यह जानता है की हां मेने ही मेरी अज्ञानता के कारण ये बुरे कर्म किये थे . पर अब आप खुद आत्मा यह महसूस करती है की वह मेरा भूतकाल था और यह मेरा वर्तमान काल है .
मतलब अब आप इस संसार को जैसा है वैसा
स्वीकार करने लगते है .
इस प्रकार से आज हमने यह समझने का प्रयास किया है की किसी भी प्रकार के अनचाहे प्रारब्ध को कैसे स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास के माध्यम से रूपांतरित किया जाता है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
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