कर्म हमारा पीछा कैसे करते है ?

जब हम इस क्षण में किसी भी रूप में कैसा भी कर्म करते है तो उसकी स्मृति हमारे मानस पटल पर अंकित हो जाती है . और हमारा मन उस क्षण की घटना को सच मान लेता है . अब यदि उस क्षण कर्म करने से हमारे मन को सुखद अनुभूति हुयी है तो हमारा मन चाहता है की वह इस अनुभूति को दुबारा अनुभव करे और हमे फिर से वही कर्म करने को प्रेरित करता है .

कर्म हमारा पीछा कैसे करते है ?

                                                                                                                                                वीडियो देखें

जब हम इस क्षण में किसी भी रूप में कैसा भी कर्म करते है तो उसकी स्मृति हमारे मानस पटल पर अंकित हो जाती है . और हमारा मन उस क्षण की घटना को सच मान लेता है . अब यदि उस क्षण कर्म करने से हमारे मन को सुखद अनुभूति हुयी है तो हमारा मन चाहता है की वह इस अनुभूति को दुबारा अनुभव करे और हमे फिर से वही कर्म करने को प्रेरित करता है .

अब इसे विज्ञानं के आधार पर समझते है

न्यूटन के पहले नियम के अनुसार, यदि कोई वस्तु गति कर रही है, तो वह तब तक उसी वेग और दिशा में गति करती रहेगी जब तक कि उस पर कोई बाहरी असंतुलित बल न लगाया जाए.

अब इसे मैं आप को मन और शरीर से जोड़कर समझाता हूँ

जैसे हमारी आँखे किसी दृश्य को देखती है . अब यदि यह दृश्य हमारे मन की समझ के अनुसार यदि आँखों को प्रिय लगता है तो हमारी आँखे इसे लगातार देखना चाहती है .

इसका मतलब यह हुआ है की यदि हमने इस अमुक दृश्य के साथ किसी पुराने समय में अच्छा अनुभव हांसिल किया है . अर्थात यह दृश्य हमारे अवचेतन मन में सुखद अनुभूति के रूप में संचित था . इसलिए अब यह हमारे मन को सुहाने वाला दृश्य प्रारब्ध के रूप में वापस अभी प्रकट हो रहा है .

अब मैं समझाता हूँ की हमारी आँखे इस दृश्य से कैसे हटती है ?

अब आप कल्पना करे की आप एक शादीशुदा व्यक्ति है . और आप के एक छोटा बच्चा है . अब यदि आप का बच्चा जोर जोर से चिल्लाकर आप को पीछे से आवाज (बाहरी असंतुलित बल) देता है तो आप इस अमुक दृश्य से अपनी आँखों को हटाकर अपने बच्चे की तरफ मोड़ लेंगे .

मतलब आप के कर्म (आप का बच्चा) ने आप का पीछा किया है .

यदि हम उस कर्म के प्रति चेतना के स्तर पर सजग है तो उसी क्षण हम यह भी देखेंगे की यदि इस कर्म को करने से मुझे सच्ची ख़ुशी मिली है और यह मेरी आत्मा के कल्याण में सहायक है तो फिर से उस कर्म को हम दोहराएंगे, नहीं तो नहीं दोहराएंगे. और यदि हम उस कर्म के प्रति चेतना के स्तर पर सजग नहीं है तो भी उस कर्म को हम दोहराएंगे क्यों की हमें मन की किसी पुरानी आदत के कारण सुखद अनुभूति हुयी है  .

·         हमारा मन शुरू से अँधा है

·         माया है

·         अल्पविकसित है

·         यह सच्ची सुखद अनुभूति को नहीं पहचानता है

·         मन आदत के साथ काम करता है

 

मन को जो सुखद और दुखद अनुभूतियाँ होती है वे दोनों ही मायावी है और हमारी चेतना जब इन अनुभूतियों से बँध जाती है तो इसे ही कर्म का बंधन अर्थात कर्मबन्धन कहते है .

हमारा मन प्रति क्षण काम करता है और हमारी जाग्रति के स्तर पर मानस पटल(अवचेतन मन में , मेमोरी चिप में , सुषुम्ना में ) पर इन अनुभूतियों को बहुत ही सूक्ष्म रूप में (ऊर्जा तरंगो के रूप में) अंकित करता जाता है जिन्हे स्मृतियाँ भी कहते है .

और लगातार मन की इन स्मृतियों के कारण हमारा मन  इन कर्मो की  पुनरावृति करता है . मन इनकी पुनरावृति इसलिए करता है की जैसे हम रास्ते मे चलते हुए  आँखों  से हमारे पीछे एक कुत्ते को आते हुए देख लेते है और फिर सीधे चलते हुए भी वह कुत्ता हमारे मन में दीखता रहता है और हम सोचते है की कही यह कुत्ता मुझे काट नहीं ले . इसलिए हम दुबारा पीछे मुड़कर उस कुत्ते को देखते है तो इस बार वह कुत्ता और नजदीक आते हुए दीखता है तो हम सीधे चलते हुए अबकी बार मन में सोचते है की कही यह कुत्ता मुझे सच में काट नहीं ले .

फिर पीछे मुड़कर हम उस कुत्ते को देखते है तो कुत्ता दूसरी दिशा में अर्थात हमारे से दूर जाते हुए दिखाई देता है . पर फिर भी मन में यह शंका बनी रहती है की कही यह कुत्ता वापस मेरे पीछे नहीं आ जाये . तो हम फिर मुड़कर देखते है तो पता चलता है की अब कुत्ता नहीं दिख रहा है .

इसका मतलब यह हुआ है जब कुत्ता हमारे पीछे से पूर्ण रूप से जा चूका था तब भी हमारे मन में कुत्ते वाला दृश्य छप चूका था और हमारे मन में कुत्ते के प्रति यह स्मृति पहले से थी की कुत्ता काटता है इसलिए हम बार बार पीछे मुड़कर देख रहे थे अर्थात हमारा मन कल्पनाओ में जीता है .

क्यों की मन खुद एक कल्पना मात्र है इसका अस्तित्व नहीं है केवल परमात्मा का अस्तित्व है

इस पुनरावृति को ही कर्म का पीछा करना कहते है .

धीरे धीरे ये स्मृतियाँ सघन रूप लेने लगती है जिसे बोलचाल की भाषा में शरीर कहते है . अर्थात हमारा शरीर हमारे मन का ही एक विस्तार रूप है . जो की हाड मांश के रूप में दीखता है जबकि सच्चाई यह है की यह हमारे संचित कर्मो का सघन रूप है .

अर्थात यह सच में हाड मांश नहीं है . यह सब परमात्मा की माया के कारण होता है और स्वयं परमात्मा यह काम करते है और खुद का एक से अनेक होने का गुण प्रकट करते है अर्थात रचनाकार स्वयं इस शरीर रुपी रचना के रूप में प्रकट हो रहे है .

जब हम स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है अर्थात सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र होकर जीवन की सभी क्रियाये करते है तब हमे इस सच का अनुभव होने लगता है और हमे लगने लगता है की मेरा खुद का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है , मै शरीर नहीं हु , प्रभु स्वयं इस शरीर के रूप में कार्य कर रहे है और हम जागने लगते है , हमारी प्रभु से एकता स्थापित होने लगती है .

अर्थात जब हम स्वरुप दर्शन क्रिया का  अभ्यास करने लगते है तो हमे हमारा मन दिखने लगता है , उसमे क्या क्या स्मृतियाँ जमा है अर्थात हमारे संचित कर्म हमे साफ़ साफ़ दिखाई देने लगते है और हमे यह मालूम चलने लगता है की कैसे हमारे मन में विचार एक्टिव होते है . अर्थात किस समय कोनसा विचार आ जाये अब यह हमारे वश में होने लगता है .

हम विचारो को देखने लगते है .और हमे साफ़ साफ़ पता लगने लगता है कोनसा विचार मुझे किधर लेकर जा रहा है . जब हमारा मन पर पूर्ण नियंत्रण आ जाता है तो हम हमारे मन को हमारी इच्छानुसार फिर से नए रूप में निर्मित करने में सक्षम हो जाते है .

कैसे विचार को ऊर्जा में और ऊर्जा को परमाणु में और परमाणु को अणु में और अणु को तरंग में और तरंग को सघन रूप में अर्थात शरीर रूप में बदल सकते है ऐसा ज्ञान प्रकट होने लगता है . अर्थात जैसा हम शरीर , बाहरी भौतिक वस्तुए , सांसारिक वैभव , धन धान्य चाहते है , इस मन के माध्यम से कल्पना करके बार बार अनुभव करके दृश्य जगत के रूप में प्रकट कर सकते है .

क्यों की जब हम जैसा चाहते है वैसा हो चूका है ऐसा बार बार फील(अनुभव) करते है तो हमारा मन अपने आप उस अनुभव को अस्तित्व में लाने के लिए काम करने लगता है . जैसे यदि हम पतले है और मोटे होना चाहते है तो पहले हम यह अनुभव करना शुरू करते है की हम मोटे चुके है .

हम हमारे शरीर को देखकर हमारे मन को यह विश्वास दिलाते है की देखो मेरा शरीर कितना मोटा हो गया है . हाथो को देखकर बहुत ख़ुशी अनुभव करते है की हाथ अब में जैसा चाहता था या चाहती थी वैसे हो गए है . ऐसी एक्टिंग करनी होती है यदि हमें हमारी दुबलेपन की पुरानी यादास्त को मोटेपन की यादास्त में रूपांतरित करना है तो . अब हमारी आत्मा(चाहे परमात्मा कहो) से हमें यह निर्देश प्राप्त होने लगते है की इस रूपांतरण के लिए मुझे क्या क्या कर्म करने बहुत जरुरी है .

जैसे एक निर्देश यह प्राप्त होता है की इस क्षण में आप के शरीर का जो रूप है वह बहुत खूबसूरत है . अर्थात हमें खुद को पूर्ण रूप से स्वीकार करना होता है . क्यों की हमारे शरीर को जो हम आँखों से देख रहे है वो सच नहीं है बल्कि जो हम अनुभव कर रहे है वो सच है .

यदि हम हमारे को बीमार अनुभव कर रहे है तो हम सच में बीमार नहीं है तो भी कुछ समय बाद बीमार होने लग जायेंगे . इसलिए हमें तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए की हमारी चेतना किस अनुभव को अस्तित्व में लाने जा रही है . इसलिए हमारे मन को हमेशा एकाग्र रखने के लिए हमारा ध्यान हमेशा भूमध्य पर रहना चाहिए .

यह दिव्य इच्छाशक्ति का केंद्र है और मन में यह कल्पना निरन्तर चलती रहनी चाहिए की मेरा शरीर जैसा में चाहता हु वैसा हो चूका है . तो इस एकाग्रता के साथ कल्पना के कारण मन की पुरानी स्मृतियाँ   (शरीर में परिवर्तन) विलीन या नयी कल्पनाओं में रूपांतरित होने लगती है जिससे मन में (शरीर में ) कई प्रकार के परिवर्तन होने लगते है .

क्यों की जब हम सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र होते हुए जीवन की सभी क्रियाये करते है तो जिन स्मृतियों को हम अब नहीं चाहते है उनकी हम पुनरावृति नहीं करते है और लगातार काफी समय तक इनकी पुनरावृति नहीं होने के कारण इनको आगे विकसित होने के लिए पोषण नहीं मिलता है और ये अनवांछित स्मृतिया निराकार में विलीन होने लगती है

यदि हम इन परिवर्तनों को बहुत ही प्रेम से स्वीकार कर लेते है तो हमारा यह रूपांतरण (ट्रांसफॉर्मेशन) 100 % सफल हो जाता है . इस ट्रांसफॉर्मेशन के दौरान जो कुछ भी स्टेप्स हमें लेने होते है वे सभी दिशा निर्देश हमें हमारी आत्मा से (परमात्मा) साफ़ साफ़ प्राप्त होते है .

इसलिए ट्रांसफॉर्मेशन में आने वाली सभी शंकाये समाप्त हो जाती है क्यों की अब हम परमात्मा से जुड़ गए है . हमारे और परमात्मा के बीच दूरी शून्य है इसका हमें अनुभव होने लग गया है . और हमारा खुद पर विश्वास बढ़ने लगता है . क्यों की अब जीवन में हम जो चाहते है वह प्राप्त होने लगता है .

इस अभ्यास में ध्यैर्य की बहुत जरुरत है . किस व्यक्ति को रूपांतरण में कितना समय लगेगा यह उसका परमात्मा में कितना विश्वास है इस पर निर्भर करता है . अर्थात यदि हम स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास नहीं करते है तो हम यंत्रवत चलते है (पुराने संचित कर्मो के आधार पर ) और यदि हम स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो हम हमारी मर्जी से चलते है .

इसलिए यदि हमें मोक्ष चाहिए तो स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करना अनिवार्य है .

यह हमने पतले से मोटे होने के ट्रांसफॉर्मेशन का उदाहरण दिया है .

इसी प्रकार हम

·         बीमारी से स्वास्थ्य में रूपांतरण

·         मोटे से पतले में

·         गौरे से काले में

·         काले से गौरे में

·         गरीब से अमीर में

अर्थात जैसा भी रूपांतरण हम चाहते है वह हम 100 % प्राप्त कर लेते है . अर्थात चाहे हमने पहले कैसे भी कर्म किये हो यदि हम परमात्मा के समक्ष पूर्ण समर्पण कर देते है और फिर यह अभ्यास पुरे मनोयोग से करते है तो हमें 100 % सफलता मिलती है .

क्यों की अब यह अभ्यास परमात्मा स्वयं कर रहे है . इसलिए हमारे मन से घृणा , निंदा , चुगली , बुराई , छल कपट , ईर्ष्या इत्यादि के विचार सद्गुणों में परिवर्तित होने लगते है . और हमारा मन एक दिव्य शरीर का निर्माण करने लग जाता है . इसी को सच्चा कर्मयोगी कहा जाता है .

धन्यवाद जी . मंगल हो जी .