ऐसा इसलिए होता है की इस इंसान ने कभी न कभी अपनी पत्नी को कई प्रकार के कष्ट दिए है . और अब वही कष्ट इस पत्नी के रूप में इसको भुगतने पड़ रहे है . और इन कष्टों को बहुत अच्छे से भोगने के लिए खुद हमारे प्रभु ही इस महिला मित्र का किरदार निभा रहे है .
घरवाली बुरी और बाहरवाली अच्छी क्यों लगती है ?
आज हमारे प्रभु
यह समझाने जा रहे है की ज्यादातर लोगों को घरवाली बुरी और बाहरवाली अच्छी क्यों
लगती है .
पहली बात तो यह है की ऐसा सभी लोगों के साथ नहीं होता है . ऐसा उन लोगों के साथ होता है जिन्होंने अभी खुद को कई प्रकार की बुरी आदतों से अपने आप को कभी न पूरी होने वाली इच्छाओं से बांध रखा है .
अर्थात ऐसे लोगों को हमेशा घरवाली ही नहीं बल्कि उनके आस पास की ज्यादातर चीजे बुरी लगती है और दूर की चीजे अच्छी लगती है .
और हम सभी को यह पता है की दूर के डूंगर दूर से ही अच्छे लगते है .
जब ऐसे व्यक्ति की आत्मा का अधिकांश हिस्सा सुप्त अवस्था में रहता है तो वह दिन में जागते हुए भी नींद में ही रहता है .
जैसे उसकी धर्मपत्नी उसके लिए भोजन पकाती है और वह उसी भोजन को अपने कार्यस्थल पर अपनी महिला मित्र के साथ खाता है . और साथ ही साथ ये दोनों इस की पत्नी की बुराई भी करते है .
ऐसा इसलिए होता है की इस इंसान ने कभी न कभी अपनी पत्नी को कई प्रकार के कष्ट दिए है .
और अब वही कष्ट इस पत्नी के रूप में इसको भुगतने पड़ रहे है .
और इन कष्टों को बहुत अच्छे से भोगने के लिए खुद हमारे प्रभु ही इस महिला मित्र का किरदार निभा रहे है .
अब यदि यह व्यक्ति स्वरुप दर्शन क्रिया
का अभ्यास करता है तो धीरे धीरे यह जाग्रत होने लगता है .
और इसको यह अहसास होने लगता है की मेरी
पत्नी मुझे कष्ट नहीं बल्कि मेरे प्रारब्ध को काट रही है .
इसलिए ऐसा इंसान यदि पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करता है तो उसे यह महसूस होने लगता है की बाहरवाली मेरी कमाई खा रही है और घरवाली मेरे कर्म काट रही है .
अब यदि यह व्यक्ति लगातार अपनी पत्नी की शिकायत करता रहता है तो यह आगे भोगने वाले नए प्रारब्ध की रचना कर रहा होता है .
और यदि यह अपनी पत्नी के व्यवहार को भीतर से बहुत ही प्रसन्न होकर सहन कर लेता है तो फिर यही पत्नी आगे चलकर इस व्यक्ति के जीवन में मंगल ही मंगल करती है .
मतलब इस व्यक्ति के माध्यम से कष्टों को
सहन करने पर एक साथ दो दो आत्माओं का कल्याण होता है .
और यदि यही व्यक्ति अपनी पत्नी के खराब व्यवहार का जवाब निंदा, बुराई और चुगली से देता है तो इस व्यक्ति के साथ साथ इसकी पत्नी का भी व्यवहार धीरे धीरे और खराब होता जाता है .
और इस काम को बढ़ावा देने में बाहरवाली
आग में घी का काम करती है .
अर्थात जैसा यह व्यक्ति बाहरवाली को अपना व्यवहार महसूस कराता है , तो वह बाहरवाली भी इस व्यक्ति को वैसा ही व्यवहार महसूस कराती है .
जैसे यह रोज पत्नी की शिकायत लेकर इस बाहरवाली के साथ चर्चा करता है तो इसका धीरे धीरे यह प्रभाव होता है की यह व्यक्ति आत्मा से दूर होता हुआ जो मायावी चीजे दिखाई देती है उन्ही में कभी न पूरा होने वाला सुख खोजने का निरंतर अभ्यास करता रहता है .
और इस व्यक्ति के इस तरह से किये गए
अभ्यास के कारण बाहरवाली इसके सामने इसकी हां में हां मिलाने वाली के रूप में
प्रकट होती है .
अर्थात खुद परमात्मा इस बाहरवाली के रूप में जिन भावों से इस व्यक्ति ने आव्हान किया है उन्ही भावों के अनुरूप प्रकट हो जाते है .
हमने वेद शास्त्रों में भी पढ़ा है की भगवान को आप जिस रूप में प्राप्त करना चाहते हो वे उसी रूप में आप के सामने प्रकट हो जायेंगे .
हम में से ज्यादातर इंसान जो चीजे अभी
हमारे पास मौजूद है उसकी कद्र करना नहीं जानते है . और ऐसा हमारे प्रारब्ध के कारण
होता है .
इसलिए अपने प्रारब्ध को बदलने के लिए हमे स्वरुप दर्शन क्रिया का नियमित अभ्यास करना चाहिए .
इस अभ्यास से आप की खुद की दृष्टि पहले खुद को देखने के नजरिये को ठीक करती है और फिर जैसे जैसे आप खुद के पास आने लगते है तो आप को अहसास होने लगता है की आप की पत्नी बहुत अच्छी है .
जब बुरे कर्मो के कारण हमारा प्रारब्ध
काटने का समय चल रहा होता है तो उस समय हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ सोयी हुयी होती है . अर्थात हमे यह होश ही नहीं
रहता है की जिस पिता ने अपनी बेटी को पाल पोषकर बड़ा करके उसका पूरा जीवन अब आप के
हाथों में सौप दिया है और हम ईश्वर को साक्षी मानकर इस कन्या से विवाह रचाते है .
और इस बेटी के सपनों को पूरा करने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देने की कश्मे खाते
है .
पर हमारे मन के अंधेपन के कारण हम इस अपूर्ण कन्या को पूर्ण करने के बजाये इसकी अपूर्णता को ही दोषी मानकर हम इस कन्या को कुरदने लगते है .
अब आप खुद ही अंदाजा लगाइए की यदि आप को कोई मेरिट में आने वाले बच्चे को पढ़ाने के लिए कहे तो आप उसे क्या सिखायेंगे.
और यदि आप को कोई पढ़ने में कमजोर बच्चा सौप दे तो उसी को तो आप कुछ नया सीखा सकते है .
और वैसे भी समर्थ व्यक्ति वह होता है जो
किसी असमर्थ को समर्थ बना देता है .
घरवाली को लेकर इस व्यक्ति के मन में ये विचार जगह बना लेते है की यह तो मुझे किसी भी समय उपलब्ध हो सकती है . पर बाहरवाली तो हर समय उपलब्ध नहीं हो सकती है . इसलिए ऐसे व्यक्ति का मन ऐसी बाहरवाली के दर्शन करने के लिए हमेशा लालाइत रहता है .
क्यों की मन की प्रकृति ही ऐसी होती है
.
हमारा मन हमेशा अधूरा रहता है . और मन की अधूरेपन की प्रकृति के कारण ही मन या तो सकारात्मकता से युक्त होकर पूर्ण होने की कोशिस करता है या फिर नकारात्मकता से युक्त होकर पूर्ण होने की कोशिस करता है .
और हम सब यह जानते है की मन भगवान से प्रकट होता है और इसकी पूर्णता भगवान से जुड़ने पर ही संभव होती है .
मन का हमेशा भगवान से जुड़े रहने का मतलब है समता भाव में रहना . और समता तभी आती है जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है . अर्थात खुद को जानने का अभ्यास करते है .
इसलिए आप आज से ही संकल्प ले की अपनी हर अच्छी बुरी आदतों पर पूरी ईमानदारी से निगरानी रखेंगे .
तो आप को पता चलेगा की अब बाहरवाली भी आप को आप की पत्नी से प्रेम करने के लिए ही कहेगी .
क्यों की अब आप अभ्यास के कारण अपने नये
उज्जवल भाग्य की रचना कर रहे है . और इससे धीरे धीरे आप का बुरा प्रारब्ध समाप्त
होकर आप के जीवन में नयी उमंग और नयी रौशनी का जन्म होगा .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
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