छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु जीवन जीने की एक पवित्र पद्धति है। यह हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, जीवन में अनुशासन, समाज में समरसता, और आत्मा की शुद्धता सिखाती है।
छठ पूजा: सार्वभौमिक महत्व और पौराणिक महिमा
छठ पूजा केवल बिहार, झारखंड या पूर्वी उत्तर प्रदेश का पर्व नहीं है, अपितु यह सम्पूर्ण मानव जाति के लिए प्रकृति, सूर्य और जीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन पर्व है। यह व्रत भारतीय संस्कृति की उस महान परम्परा का प्रतीक है जो प्रकृति के साथ मनुष्य के सनातन सम्बन्ध को दर्शाता है।
पौराणिक महत्व और कथाएँ
रामायण से सम्बन्ध
पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, जब भगवान श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे, तो दीपावली के छठे दिन माता सीता और भगवान राम ने सूर्य देव की आराधना करते हुए छठ व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से अयोध्या में समृद्धि, शान्ति और सुख का वातावरण स्थापित हुआ। यह व्रत राज्याभिषेक के पश्चात प्रजा के कल्याण और राज्य की समृद्धि के लिए किया गया था।
महाभारत काल की कथा
महाभारत काल में अंगराज कर्ण सूर्य पुत्र थे। वे प्रतिदिन जल में खड़े होकर सूर्य देव की उपासना करते थे। कर्ण की यह आराधना ही छठ पूजा का प्राचीनतम रूप मानी जाती है। कर्ण की भक्ति और तपस्या से प्रभावित होकर सूर्य देव ने उन्हें अभेद्य कवच-कुण्डल प्रदान किए थे।
द्रौपदी की कथा
महाभारत के अनुसार, जब पाण्डव अपना राज्य जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठी मैया की आराधना की थी। उनकी अटूट श्रद्धा और कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर छठी मैया (षष्ठी देवी) ने पाण्डवों को पुनः राज्य प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि यह व्रत संकट निवारण और मनोकामना पूर्ति का सशक्त माध्यम है।
सूर्य पुत्र सुग्रीव की कथा
रामायण में वर्णित सुग्रीव भी सूर्य पुत्र थे। उन्होंने अपनी शक्ति और पराक्रम को बनाए रखने के लिए नियमित रूप से सूर्य उपासना की। यह उपासना ही छठ पूजा का आदि स्वरूप माना जाता है।
वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व
सूर्य: जीवन का आधार
सूर्य केवल एक खगोलीय पिण्ड नहीं, अपितु समस्त जीवन का आधार है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह जान लिया था कि सूर्य की किरणों में अद्भुत रोगनाशक शक्ति है। छठ पूजा के समय सूर्योदय और सूर्यास्त के समय जल में खड़े होकर अर्घ्य देने से शरीर को विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है।
प्राकृतिक चिकित्सा
छठ व्रत के दौरान व्रती जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें कम हानिकारक और अधिक लाभदायक होती हैं। यह त्वचा रोगों, हड्डियों की कमजोरी और अनेक शारीरिक व्याधियों में लाभकारी है।
मानसिक शान्ति और आत्म-संयम
छठ व्रत का कठोर अनुशासन मनुष्य को आत्म-नियंत्रण सिखाता है। छत्तीस घण्टे निर्जला उपवास, शुद्ध विचार, और निष्ठापूर्वक आराधना से मानसिक दृढ़ता और आध्यात्मिक उन्नति होती है।
सर्वव्यापी महत्व: क्यों सभी को करना चाहिए छठ पूजा
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
छठ पूजा हमें सिखाती है कि हम प्रकृति के ऋणी हैं। सूर्य, जल, वायु, पृथ्वी - ये सभी तत्व हमारे जीवन के आधार हैं। चाहे हम किसी भी प्रदेश के निवासी हों, सूर्य की किरणें सभी पर समान रूप से पड़ती हैं। अतः यह पर्व राष्ट्रीय नहीं, अपितु सार्वभौमिक है।
पर्यावरण संरक्षण का सन्देश
छठ पूजा में प्रकृति को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाई जाती। नदी, तालाब और जलाशयों की सफाई की जाती है। बाँस, मिट्टी के दीपक, और प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग होता है। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण का अनुपम उदाहरण है।
सामाजिक समरसता
छठ पूजा में जाति, धर्म, अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता। सभी एक साथ घाट पर खड़े होकर सूर्य देव की आराधना करते हैं। यह सामाजिक समानता और भाईचारे का प्रतीक है।
पारिवारिक एकता
छठ व्रत पूरा परिवार मिलकर सम्पन्न करता है। व्रती के साथ पूरा परिवार व्रत के नियमों का पालन करता है। यह पारिवारिक बन्धनों को मजबूत करता है और सामूहिक उत्सव की भावना विकसित करता है।
स्वास्थ्य लाभ
छठ व्रत के नियमों का पालन करने से शरीर में नवीन ऊर्जा का संचार होता है। विषैले तत्वों का शोधन होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह प्राकृतिक डिटॉक्सिफिकेशन की प्रक्रिया है।
छठ पूजा की विधि और परम्परा
चार दिवसीय पर्व
प्रथम दिन - नहाय-खाय: व्रती पवित्र स्नान कर शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण करते हैं।
द्वितीय दिन - खरना: पूरे दिन उपवास रखकर सायंकाल गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
तृतीय दिन - संध्या अर्घ्य: डूबते सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है। यह छत्तीस घण्टे के निर्जला व्रत का आरम्भ होता है।
चतुर्थ दिन - उषा अर्घ्य: प्रातःकाल उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन होता है।
प्रसाद की पवित्रता
छठ पूजा में ठेकुआ, चावल के लड्डू, नारियल, केला, और मौसमी फलों का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसमें किसी भी प्रकार के प्याज, लहसुन या तामसिक वस्तुओं का प्रयोग नहीं होता।
आधुनिक युग में छठ पूजा की प्रासंगिकता
आध्यात्मिक जागरण
आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है। छठ पूजा हमें पुनः प्रकृति से जोड़ती है और आध्यात्मिक चेतना जागृत करती है।
तनाव मुक्ति
आधुनिक जीवन की भागदौड़ में मानसिक तनाव एक गम्भीर समस्या है। छठ व्रत का अनुशासन और ध्यान मनुष्य को तनाव से मुक्ति दिलाता है।
सांस्कृतिक संरक्षण
छठ पूजा हमारी प्राचीन परम्पराओं को जीवित रखने का माध्यम है। यह नई पीढ़ी को हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर से परिचित कराती है।
सर्वधर्म समभाव
छठ पूजा किसी एक सम्प्रदाय या मत की पूजा नहीं है। सूर्य की आराधना सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में विद्यमान है। अतः यह पर्व सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है।
राष्ट्रीय एकता का प्रतीक
आज छठ पूजा केवल बिहार तक सीमित नहीं रही। दिल्ली, मुम्बई, बंगलुरु, हैदराबाद, और विदेशों में भी यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। यह राष्ट्रीय एकता और भारतीय संस्कृति के विस्तार का प्रमाण है।
निष्कर्ष
छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु जीवन जीने की एक पवित्र पद्धति है। यह हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, जीवन में अनुशासन, समाज में समरसता, और आत्मा की शुद्धता सिखाती है।
सूर्य देव सम्पूर्ण विश्व के पालनहार हैं, उनकी कृपा से ही धरती पर जीवन सम्भव है। अतः छठ पूजा केवल कुछ विशिष्ट राज्यों का पर्व न होकर, सम्पूर्ण मानवता का पर्व है।
इस पावन पर्व को अपनाकर हम न केवल अपने स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन भी ला सकते हैं। छठ पूजा का सन्देश है - प्रकृति के साथ सामंजस्य, जीवन में सादगी, और हृदय में पवित्रता।
आइए, हम सब मिलकर इस महान पर्व को अपनाएँ और अपने जीवन को प्रकृति के अनुकूल बनाएँ। छठ माता की जय! सूर्य देव की जय!
ॐ सूर्याय नमः। ॐ षष्ठी देव्यै नमः।
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