सम्राट अशोक की जय! धर्म की जय! हिंसा की जय!
चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान की जीवन गाथा
भारतीय इतिहास में अनेक महान शासक हुए, किंतु चक्रवर्ती सम्राट अशोक का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। अशोक महान, जिन्हें 'देवानामप्रिय' (देवताओं के प्रिय) और 'प्रियदर्शी' (सबके प्रिय) के नाम से भी जाना जाता है, मौर्य वंश के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली सम्राट थे। उनका शासनकाल ईसा पूर्व 268 से 232 तक रहा, जो भारतीय इतिहास का स्वर्णिम काल माना जाता है।
वंश परंपरा: चंद्रगुप्त मौर्य से अशोक तक
चंद्रगुप्त मौर्य - साम्राज्य की नींव
मौर्य साम्राज्य की स्थापना महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने ईसा पूर्व 321 में की थी। चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म लगभग 345 ईसा पूर्व में हुआ था। उन्होंने अपने गुरु चाणक्य (कौटिल्य या विष्णुगुप्त) के मार्गदर्शन में नंद वंश के अंतिम शासक घनानंद को पराजित कर मगध साम्राज्य पर अधिकार किया। चंद्रगुप्त ने न केवल भारत के अधिकांश भाग को अपने अधीन किया, बल्कि सिकंदर के उत्तराधिकारी सेल्यूकस निकेटर को भी 305 ईसा पूर्व में युद्ध में पराजित किया।
चंद्रगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक विस्तृत था। यह भारतीय इतिहास का पहला विशाल एकीकृत साम्राज्य था। चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 24 वर्षों तक शासन किया और अंत में जैन धर्म स्वीकार कर श्रवणबेलगोला में संन्यास ले लिया।
बिंदुसार - साम्राज्य का विस्तार
चंद्रगुप्त मौर्य के पश्चात उनके पुत्र बिंदुसार ने लगभग 297 ईसा पूर्व में सिंहासन संभाला। बिंदुसार को 'अमित्रघात' (शत्रुओं का नाश करने वाला) के नाम से भी जाना जाता था। यूनानी इतिहासकारों ने उन्हें 'अमित्रोकाडेस' कहा है। बिंदुसार एक योग्य शासक थे और उन्होंने अपने पिता के साम्राज्य को दक्षिण भारत में और विस्तारित किया।
बिंदुसार ने लगभग 25 वर्षों तक शासन किया और दक्षिण में मैसूर तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। केवल कलिंग (आधुनिक ओडिशा) ही मौर्य साम्राज्य के बाहर रहा। बिंदुसार दर्शन और साहित्य के प्रेमी थे तथा उन्होंने यूनानी राजा एंटियोकस से दार्शनिक भेजने का अनुरोध किया था। बिंदुसार की अनेक रानियां थीं और लगभग 101 पुत्र थे, जिनमें अशोक सबसे योग्य और महत्वाकांक्षी थे।
अशोक का प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक
जन्म और बचपन
सम्राट अशोक का जन्म लगभग 304 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में हुआ था। उनके पिता बिंदुसार और माता का नाम सुभद्रांगी या धर्मा बताया जाता है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, अशोक की माता एक साधारण परिवार से थीं और इसलिए राजमहल में उन्हें उचित सम्मान नहीं मिलता था।
अशोक बचपन से ही बहुत प्रतिभाशाली, साहसी और महत्वाकांक्षी थे। उन्होंने युद्ध कला, घुड़सवारी, तलवारबाजी और राजनीति की शिक्षा प्राप्त की। अपनी योग्यता के कारण वे अपने पिता के प्रिय पुत्र बन गए। युवावस्था में ही अशोक ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए एक हिंसक शेर को मार गिराया था।
राज्यपाल के रूप में
अशोक की प्रतिभा को देखते हुए बिंदुसार ने उन्हें उज्जयिनी (आधुनिक उज्जैन) और तक्षशिला के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया। तक्षशिला में विद्रोह को दबाने के लिए अशोक ने अपनी कूटनीतिक और सैन्य कुशलता का परिचय दिया। उज्जयिनी में रहते हुए अशोक की मुलाकात देवी नामक एक सुंदर कन्या से हुई, जो बाद में उनकी पत्नी बनीं। देवी से उन्हें दो संतानें हुईं - पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा, जिन्होंने बाद में बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सिंहासन के लिए संघर्ष
बिंदुसार की मृत्यु के पश्चात (273 ईसा पूर्व) सिंहासन के लिए भीषण संघर्ष हुआ। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, अशोक के 99 भाइयों में से सुसीम सबसे बड़े थे और सिंहासन के उत्तराधिकारी माने जाते थे। परंतु अशोक अपनी योग्यता, सैन्य कौशल और समर्थकों के बल पर अपने सभी भाइयों को हराकर सिंहासन प्राप्त करने में सफल रहे।
बौद्ध ग्रंथ 'दीपवंश' के अनुसार, सिंहासन प्राप्त करने के लिए अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर दी थी, हालांकि इतिहासकार इस बात को अतिशयोक्ति मानते हैं। 268 ईसा पूर्व में अशोक का औपचारिक राज्याभिषेक हुआ। इस प्रकार मौर्य वंश का सबसे शक्तिशाली सम्राट सिंहासन पर आसीन हुआ।
साम्राज्य विस्तार और विजय अभियान
प्रारंभिक शासन काल
अशोक के शासन का प्रारंभिक काल विजय और साम्राज्य विस्तार का काल था। उन्होंने अपने पिता और दादा द्वारा स्थापित विशाल साम्राज्य को और मजबूत किया। अशोक के साम्राज्य की सीमाएं पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक, उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में मैसूर तक विस्तृत थीं।
अशोक ने अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करने के लिए सुचारू प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। उन्होंने अपने साम्राज्य को चार प्रांतों में विभाजित किया - उत्तरी प्रांत की राजधानी तक्षशिला, पश्चिमी प्रांत की राजधानी उज्जयिनी, दक्षिणी प्रांत की राजधानी सुवर्णगिरि और पूर्वी प्रांत की राजधानी तोसली थी। केंद्रीय प्रशासन पाटलिपुत्र से संचालित होता था।
कलिंग विजय - इतिहास का निर्णायक युद्ध
अशोक के राज्याभिषेक के आठ वर्ष पश्चात, 261 ईसा पूर्व में, भारतीय इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध हुआ - कलिंग युद्ध। कलिंग (आधुनिक ओडिशा) एकमात्र शक्तिशाली राज्य था जो मौर्य साम्राज्य के बाहर था। कलिंग का भौगोलिक और सामरिक महत्व अत्यधिक था। यह दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के व्यापार मार्ग पर स्थित था।
कलिंग युद्ध अत्यंत भयानक और रक्तरंजित था। अशोक के तेरहवें शिलालेख के अनुसार, इस युद्ध में एक लाख पचास हजार लोग बंदी बनाए गए, एक लाख लोग मारे गए और इससे कई गुना अधिक लोग परोक्ष रूप से मारे गए। युद्ध की भीषणता इतनी अधिक थी कि दया नदी का जल रक्त से लाल हो गया था। चारों ओर शवों के ढेर लगे थे, विलाप और रोने की आवाजें गूंज रही थीं।
इस विजय ने अशोक के मन में गहरा परिवर्तन ला दिया। युद्धभूमि में मृत शरीरों को देखकर, घायलों की चीखें सुनकर और विधवाओं और अनाथों के आंसुओं को देखकर अशोक का हृदय पश्चाताप से भर गया। वे युद्ध की विभीषिका से इतने व्यथित हुए कि उन्होंने भविष्य में कभी युद्ध न करने की प्रतिज्ञा ली। इस घटना ने अशोक को 'चंडाशोक' (क्रूर अशोक) से 'धर्माशोक' (धर्मपरायण अशोक) में बदल दिया।
बौद्ध धर्म की ओर प्रवृत्ति
धार्मिक परिवर्तन
कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, भिक्षु निग्रोध और उपगुप्त के संपर्क में आने के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। उन्होंने गौतम बुद्ध के उपदेशों में शांति, अहिंसा और करुणा का संदेश पाया। बौद्ध धर्म के सिद्धांतों ने अशोक के जीवन और शासन को पूरी तरह बदल दिया।
अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार करने के पश्चात 'धम्म' (धर्म) को अपने जीवन का आधार बनाया। उनका 'धम्म' किसी विशेष धर्म का नाम नहीं था, बल्कि एक जीवन पद्धति थी जो अहिंसा, सत्य, करुणा, दया, सहनशीलता, और नैतिक आचरण पर आधारित थी। अशोक ने अपने शिलालेखों में धम्म के सिद्धांतों को विस्तार से बताया है।
धम्म के सिद्धांत
अशोक के धम्म में निम्नलिखित मुख्य बातें थीं:
- सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा और करुणा
- माता-पिता की सेवा और बड़ों का सम्मान
- गुरुजनों और ब्राह्मणों का आदर
- मित्रों, परिवार और सेवकों के साथ उदार व्यवहार
- दानशीलता और परोपकार
- सत्य बोलना और ईमानदारी
- सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता और सम्मान
अखंड भारत का स्वप्न और शासन
साम्राज्य का विस्तार
अशोक का साम्राज्य इतिहास के सबसे विशाल साम्राज्यों में से एक था। उनका साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में मैसूर तक, पश्चिम में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल और असम तक फैला हुआ था। अशोक का साम्राज्य लगभग 50 लाख वर्ग किलोमीटर में विस्तृत था।
अशोक के साम्राज्य में निम्नलिखित भौगोलिक क्षेत्र शामिल थे:
- उत्तर में काश्मीर, गांधार, कंबोज (अफगानिस्तान)
- पश्चिम में सौराष्ट्र (गुजरात), महाराष्ट्र
- पूर्व में बंगाल, कलिंग (ओडिशा)
- दक्षिण में मैसूर तक
- केवल कालिंग प्रदेश को छोड़कर संपूर्ण भारतवर्ष
अशोक का साम्राज्य वास्तव में एक 'अखंड भारत' का प्रतिनिधित्व करता था। यह पहली बार था जब इतना विशाल भारतीय उपमहाद्वीप एक केंद्रीय शासन के अधीन था। अशोक ने अपने शिलालेखों में यवन (यूनानी), कंबोज, गांधार, नाभक, नाभपंति जैसे विभिन्न जनपदों का उल्लेख किया है।
प्रशासनिक व्यवस्था
अशोक की प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत सुव्यवस्थित और प्रजाहितैषी थी। उन्होंने अपने विशाल साम्राज्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए निम्नलिखित व्यवस्था की:
केंद्रीय प्रशासन: पाटलिपुत्र केंद्रीय सत्ता का केंद्र था जहां से सम्पूर्ण साम्राज्य का संचालन होता था।
प्रांतीय व्यवस्था: साम्राज्य को चार प्रमुख प्रांतों में विभाजित किया गया था, जिनमें राजकुमारों या कुमारों को राज्यपाल नियुक्त किया जाता था।
धम्म महामात्य: अशोक ने धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त किए जो धम्म महामात्य कहलाते थे। ये अधिकारी जनता में धम्म का प्रचार करते थे और सामाजिक कल्याण के कार्य करते थे।
न्याय व्यवस्था: अशोक ने न्याय व्यवस्था में सुधार किए और राजुक (न्यायाधिकारी) नियुक्त किए। उन्होंने घोषणा की कि प्रत्येक पांच वर्ष में वे स्वयं न्याय की देखभाल करेंगे।
जनकल्याणकारी कार्य
अशोक ने अपनी प्रजा के कल्याण के लिए अनेक कार्य किए:
चिकित्सा सुविधाएं: मनुष्यों और पशुओं के लिए अलग-अलग अस्पताल बनवाए। औषधीय वनस्पतियों का रोपण करवाया।
सड़कें और विश्रामगृह: साम्राज्य भर में सड़कों का निर्माण करवाया। यात्रियों के लिए विश्रामगृह और धर्मशालाएं बनवाईं। सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाए और कुएं खुदवाए।
शिक्षा का प्रसार: बौद्ध विहारों और शिक्षा केंद्रों की स्थापना की। तक्षशिला और नालंदा जैसे महान शिक्षा केंद्र इसी काल में विकसित हुए।
पशु कल्याण: पशुओं की बलि और अनावश्यक हत्या पर रोक लगाई। पशुओं के लिए चारागाह और जलाशय बनवाए।
धम्म विजय - शांति का साम्राज्य
कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने दिग्विजय (सैन्य विजय) के स्थान पर धम्म विजय (नैतिक विजय) को अपनाया। उन्होंने घोषणा की कि अब वे तलवार के बल पर नहीं बल्कि धम्म के प्रचार से विजय प्राप्त करेंगे। अशोक के शिलालेख में लिखा है: "देवानांप्रिय प्रियदर्शी सभी विजयों में धम्म विजय को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।"
अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भारत और विदेशों में धर्मप्रचारक भेजे। उनके पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। अशोक के प्रयासों से बौद्ध धर्म का प्रसार मध्य एशिया, नेपाल, तिब्बत, चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया में हुआ।
शिलालेख और अभिलेख - अशोक की वाणी
अशोक ने अपने विचारों, नीतियों और धम्म के सिद्धांतों को जनता तक पहुंचाने के लिए पत्थरों और स्तंभों पर शिलालेख लिखवाए। ये शिलालेख भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल में पाए गए हैं। कुल मिलाकर लगभग 33 शिलालेख और स्तंभ लेख खोजे गए हैं।
प्रमुख शिलालेख:
चौदह शिला लेख: ये अशोक के धम्म, नीतियों और कार्यों का विवरण देते हैं। इनमें तेरहवां शिला लेख सबसे महत्वपूर्ण है जो कलिंग युद्ध का वर्णन करता है।
स्तंभ लेख: अशोक ने पॉलिश किए हुए पत्थर के स्तंभ बनवाए जिन पर धम्म के उपदेश लिखे हैं। सारनाथ का सिंह स्तंभ (जो अब भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है) इसी काल का है।
लघु शिला लेख और गुहा लेख: विभिन्न स्थानों पर छोटे शिलालेख और गुफाओं में लेख भी उत्कीर्ण हैं।
ये शिलालेख ब्राह्मी, खरोष्ठी, यूनानी और अरामाइक लिपियों में लिखे गए हैं, जो अशोक के विशाल साम्राज्य की बहुभाषी प्रकृति को दर्शाते हैं।
अशोक की विरासत
वास्तुकला और कला
अशोक के काल में कला और वास्तुकला का अभूतपूर्व विकास हुआ। अशोक स्तंभ भारतीय वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं। सारनाथ के सिंह स्तंभ की चार सिंहों की मूर्ति अद्वितीय है। इसके नीचे धर्मचक्र और चार पशु (सिंह, बैल, घोड़ा, हाथी) उत्कीर्ण हैं।
अशोक ने 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया। सांची का महान स्तूप अशोक कालीन वास्तुकला का सर्वोत्तम उदाहरण है। ये स्तूप बौद्ध धर्म के प्रतीक हैं और आज भी भारतीय संस्कृति की महान धरोहर हैं।
भारतीय इतिहास में योगदान
अशोक ने भारतीय इतिहास में अमिट छाप छोड़ी:
राजनीतिक एकता: अशोक ने पहली बार संपूर्ण भारत को एक राजनीतिक इकाई के रूप में संगठित किया।
धर्म निरपेक्षता: अशोक सभी धर्मों का सम्मान करते थे। उनके शिलालेखों में सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता की बात कही गई है।
अहिंसा और शांति: अशोक ने युद्ध के स्थान पर शांति और अहिंसा को अपनाया। यह विश्व इतिहास में एक अनूठी घटना थी।
जनकल्याण: अशोक ने जनता के कल्याण को अपने शासन का प्रमुख उद्देश्य बनाया। उनकी कल्याणकारी नीतियां आधुनिक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के समान थीं।
बौद्ध धर्म का प्रसार: अशोक के प्रयासों से बौद्ध धर्म भारत से बाहर एशिया के विभिन्न भागों में फैला।
विश्व इतिहास में स्थान
अशोक केवल भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व इतिहास के महान शासकों में से एक हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार एच.जी. वेल्स ने लिखा है: "इतिहास में अशोक का स्थान और भी उज्ज्वल हो जाता है, क्योंकि हजारों नामों के बीच अशोक का नाम चमकता तारे की तरह दिखाई पड़ता है।"
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था: "अशोक का नाम इतिहास में अमर हो गया है क्योंकि उन्होंने युद्ध और विजय को त्याग कर धर्म और शांति को अपनाया।"
आधुनिक भारत में अशोक की विरासत
स्वतंत्र भारत ने अशोक की विरासत को अपनाया है:
राष्ट्रीय प्रतीक: सारनाथ के सिंह स्तंभ को भारत का राष्ट्रीय प्रतीक बनाया गया है। चार सिंह शक्ति, साहस, गर्व और आत्मविश्वास के प्रतीक हैं।
राष्ट्रीय ध्वज: अशोक चक्र (24 तीलियों वाला धर्मचक्र) भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में है। यह धर्म, सत्य और न्याय का प्रतीक है।
मुद्रा और डाक टिकट: भारतीय मुद्राओं और डाक टिकटों पर अशोक स्तंभ अंकित है।
अशोक चक्र सम्मान: भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "अशोक चक्र" अशोक के नाम पर है।
अशोक का अंतिम काल और निधन
अशोक ने लगभग 36-37 वर्षों तक शासन किया। उनके शासन के अंतिम वर्षों के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, अशोक के अंतिम दिनों में उनके पौत्र संप्रति ने सत्ता संभाली।
अशोक की मृत्यु लगभग 232 ईसा पूर्व में हुई। उनकी मृत्यु के पश्चात मौर्य साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होता गया और अंततः 185 ईसा पूर्व में शुंग वंश ने मौर्य वंश को समाप्त कर दिया। परंतु अशोक की विरासत हमेशा के लिए अमर हो गई।
निष्कर्ष: अशोक महान - एक अद्वितीय शासक
सम्राट अशोक भारतीय और विश्व इतिहास के अद्वितीय शासक थे। वे एकमात्र ऐसे शासक थे जिन्होंने विजय के शिखर पर पहुंचकर युद्ध का त्याग किया और अहिंसा और शांति को अपनाया। उनका जीवन हिंसा से अहिंसा की ओर, घृणा से प्रेम की ओर, और युद्ध से शांति की ओर परिवर्तन का महान उदाहरण है।
अशोक ने चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित साम्राज्य को न केवल बनाए रखा बल्कि उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने अपने विशाल साम्राज्य में धर्म, न्याय, अहिंसा और जनकल्याण के सिद्धांतों को स्थापित किया। अशोक का "धम्म" मानवता के लिए एक शाश्वत संदेश है।
अशोक की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने शक्ति का उपयोग शांति और कल्याण के लिए किया। वे केवल एक विजेता नहीं थे, बल्कि एक महान मानवतावादी, दूरदर्शी शासक और धर्म प्रचारक थे। उनके शिलालेख आज भी हमें सत्य, अहिंसा, सहनशीलता और मानव कल्याण का संदेश देते हैं।
अशोक महान ने सिद्ध कर दिया कि सच्ची विजय तलवार से नहीं बल्कि प्रेम, करुणा और धर्म से होती है। उनका जीवन और कार्य आज भी विश्व के शासकों और नेताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। अशोक का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है और युग-युगांतर तक अंकित रहेगा।
सम्राट अशोक की जय! धर्म की जय! हिंसा की जय!
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