भगवान की माया कैसे काम करती है ?
16 Oct, 2025
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आप ने कई बार देखा होगा की जब आप किसी का नाम लिए बिना उसके गलत काम को अपने किसी परिचित या अन्य व्यक्ति को बताते है तो वह आप से सबसे पहले इस गलती करने वाले व्यक्ति का नाम अवश्य पूछता है .
मेरे प्रिय मित्रों आज हमारे प्रभु हमे यह समझा रहे है की उनकी माया कैसे काम करती है ?.
आप ने कई बार देखा होगा की जब आप किसी
का नाम लिए बिना उसके गलत काम को अपने किसी परिचित या अन्य व्यक्ति को बताते है तो
वह आप से सबसे पहले इस गलती करने वाले व्यक्ति का नाम अवश्य पूछता है .
और आप इस डर से बताना नहीं चाहते है की कही आप परेशानी में फस नहीं जाए . आप नाम नहीं बताकर बिलकुल ठीक करते है . क्यों की नाम उजागर होते ही माया का खेल ख़त्म होने लगता है . और भगवान की माया ख़त्म नहीं होना चाहती है . इसलिए आप के नाम बताते ही वह व्यक्ति जिसने गलत काम किया है अपने आप को समाज के सामने और खुद की नज़र में बचाने के लिए उल्टा आप को ही बदनाम करके सुरक्षित होने के उपाय करता है .
और यदि अमुक इंसान ने कोई महान कार्य किया है और अब आप उसके इस महान कार्य को अपने दोस्तों को उसका नाम लिए बिना बताते है तो इसे बुरा लगता है .
क्यों की हम में से सभी अच्छे काम को
खुद का बताते है और बुरे काम को सामने वाले का बताते है .
और जिस प्रकार हम बुराई स्वीकार नहीं करना चाहते है ठीक इसी प्रकार सामने वाला भी बुराई स्वीकार करना नहीं चाहता है .
माया का विनाशकारी रॉ मैटेरियल:
- झूठ बोलना
- चुगली करना
- चोरी करना
- मारना पीटना
- प्रबल अहंकार
- निंदा करना
- चिढ़ाना
- अत्यधिक वासनाएँ
माया का सृजनकारी रॉ मैटेरियल :
- प्रेरणा
- सुरक्षा
- अपनापन
- प्रेम
- सेवा
- उत्साह
- निर्मलता
- शांति
- खोज
माया का मतलब जो सच में है नहीं पर
महसूस होती हो . फिर चाहे दृश्य रूप में या अदृश्य रूप में .
माया
को चुनौती नहीं दी जा सकती है . क्यों ?
क्यों की जो चीज वास्तविक रूप में अस्तित्व में ही नहीं है फिर आप चुनौती किसे देंगे .
अर्थात आप अपनी छाया से ही कैसे लड़ेंगे . आप का शरीर और यह पूरा संसार भगवान् की छाया है . छाया को मिटाने लगोगे तो यह फिर दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाती है .
जैसे
आप किसी जीव को क्रोध में आकर मार देते है तो इसका मतलब यह नहीं है की वह जीव मर गया
है . बल्कि उस जीव ने अपना रूप परिवर्तित कर लिया है .
और अब वह आगे आप से बदला लेने के लिए पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है . क्यों की वह अब सूक्ष्म शरीर में आ गया है . और सूक्ष्म शरीर की क्षमता भौतिक शरीर से ज्यादा होती है . क्यों की जैसा हम कर्म करते है वैसा ही हमे फल मिलता है .
एक भी बैक्टीरिया को यदि हम मार देते है तो उसका बुरा प्रभाव हमारे ऊपर अवश्य पड़ता है .
पर हम इसके साथ ही अनेक जीवों का पालन पोषण करने के कारण उन जीवों से हमे शक्ति लगातार मिलती रहती है . इसलिए हम हमेशा नकारात्मक और सकारात्मक शक्तियों से घिरे रहते है .
माया इन्ही दो शक्तियों से अपना रूप बदल
लेती है .
माया
की तीसरी शक्ति को सुरक्षा की शक्ति कहते है .
जब आप समता भाव में जीने का अभ्यास करते है तो फिर आप के भीतर सुरक्षा की शक्ति संचित होने लगती है . अब आप देवता और राक्षस दोनों के साथ खुश रहने लगते है .
इसे आप ऐसे भी समझ सकते है की खुद प्रभु ही झगड़ा कराने वाले और झगड़ा समाप्त कराने वाले के रूप में किरदार निभा रहे है .
आप और
मै दोनों भीतर से इस तरह जुड़े है की मेरे और आप के बीच वास्तविक दूरी शून्य है .
पर मेरे और आप के कर्मो की छाया ही यह शरीर और संसार का रूप धारण कर रखी है .
हमारे दोनों के कर्म इस प्रकार से है की यदि मुझे कोई बर्तन गिलास के रूप में दिखाई दे रहा है तो वही बर्तन आप को थाली के रूप में दिखाई दे रहा है .
अब हम दोनों अपने अपने अनुभव को सच साबित करने के लिए एक दूसरे के कपड़े फाड़ रहे है और हमारे प्रभु अपनी इस लीला का आनंद ले रहे है .
आप कभी यह करके देखना की जब कोई व्यक्ति नींद में सो रहा हो और आप उसे अपने काम के लिए बार बार जगा रहे हो . तो वह आसानी से नहीं उठेगा . क्यों की इस स्थिति में माया का कुछ खेल मशालेदार नहीं होता है .
पर जब
आप इसी व्यक्ति को उसकी बहुत ही प्रिये चीज खो जाने की खबर देंगे तो यह व्यक्ति झट
से उठ खड़ा हो जायेगा . क्यों की अब इसे कुछ खोने का डर सता रहा है .
इसलिए इस माया जगत में केवल भगवान को सम्पूर्ण रूप से समर्पित व्यक्ति ही खुश रहता है . बाकी हम सभी किसी न किसी समस्या से हमेशा परेशान रहते है .
आप अभी
इसी वक्त सम्पूर्ण प्रकार की इच्छाओं से मुक्त होने का अभ्यास करके देखो . आप खुद
चकित रह जायेंगे .
आप
इतने हलके और आनंदित महसूस करेंगे जिसे मै शब्दों में बयान नहीं कर सकता हूँ .
माया को आप खुद ही लगातार सुख दुःख की अनुभूति करके प्रकट कर रहे है . जब आप पूर्ण रूप से सुख दुःख से ऊपर उठ जाते है तो भगवान् की प्रकृति आप के साथ ऐसी लीला रचती है की आप फिर से सुख दुःख की अनुभूति महसूस करने लगते है .
जैसे आप के सामने ऐसा दृश्य दिखाया जायेगा की आप को यह लगेगा की मुझे ही अब इन लोगों की जान बचाना पड़ेगा .
और
जैसे ही आप इन लोगों की जान बचाने के लिए उठेंगे तो अब प्रकृति ऐसी लीला रचेगी की
आप सब लोगों की जान नहीं बचा पाएंगे . और जिन लोगों की आप जान नहीं बचाएंगे वे आप
को भला बुरा कहने लगेंगे .
और फिर से आप के मन में एक अभाव पैदा हो जायेगा . आप को यह लगेगा की आप ने पक्ष पात किया है .
इसलिए हर कोई इस मायाजाल से मुक्त होना चाहता है . पर मुक्त केवल भगवान की शरण में जाकर ही हुआ जाता है .
इसलिए हमे नियमित रूप से स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करना बहुत ही अनिवार्य है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
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