आपको कर्म को भुगताने के लिए कैसे प्रारब्ध आप की बुद्धि को घुमा देता है ?

स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास आप को आगंतुक कर्मो के प्रति सचेत करता है . इसलिए जब आप निरंतर स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो धीरे धीरे आप को यह पता चलने लगता है की कोनसा कर्म आपको भुगतना ही पड़ेगा और किस कर्म को आप रूपांतरित कर सकते है .

आपको कर्म को भुगताने के लिए कैसे प्रारब्ध आप की बुद्धि को घुमा देता है ?

आज हमारे प्यारे मित्रों हमारे प्यारे प्रभु हमे एक ऐसे ज्ञान को समझा रहे है जिसे यदि आप ने ठीक से समझ लिया तो फिर आपका  जो कर्म अभी पीछा कर रहा है आप उसके प्रति सचेत रहेंगे .

और स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास आप को आगंतुक कर्मो के प्रति सचेत करता है . इसलिए जब आप निरंतर स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो धीरे धीरे आप को यह पता चलने लगता है की कोनसा कर्म आपको भुगतना ही पड़ेगा और किस कर्म को आप रूपांतरित कर सकते है .

जैसे आप के घर पर आप के बहुत ही घनिस्ट मित्र बहुत दिनों बाद आये है . और इसी समय आप को कही जरुरी काम के लिए घर से बाहर भी जाना बहुत जरुरी है .

पर आप के मन में यह विचार बार बार आ रहा है की यार मेरे मित्र को कम से कम चाय तो पिलाकर भेजू . इसलिए यदि आप के पास चाय की अभी व्येवस्था नहीं भी है तब भी आप अपने मित्र के लिए कैसे न कैसे करके चाय की व्येवस्था कर ही लेंगे .

और फिर मित्र को जल्दी से विदा करके अपने काम के लिए भी आप निकल जायेंगे .

अब आप यह सोचे की यदि इस मित्र की जगह यदि कोई ऐसा इंसान आता जिसे आप भीतर से प्रेम ज्यादा नहीं करते है .

अर्थात आप के अवचेतन मन में इस इंसान के लिए कोई विशेष स्मृति संचित नहीं है . तो फिर ऐसे इंसान के आने पर आप बहुत ही आसानी से यह कह कर घर से बाहर निकल जायेंगे की आप फिर कभी फुर्सत में आना मुझे अभी कही बहुत ही जरुरी काम के लिए घर से बाहर जाना है .

और आप को यदि ऐसा कहता हुआ कोई अन्य इंसान देख भी ले तो उसे भी आप का यह व्यवहार सच्चा और अच्छा लगेगा .

और हो सकता है की यह अन्य इंसान आप की तारीफ में दो शब्द यह भी बोल दे की आप बहुत ही बढ़िया इंसान हो और आप किसी को बिना चाय पिलाये अपने घर से युही नहीं भेजते हो . और आगे यह भी कह सकता है की आप को काम ही बहुत जरुरी आ गया था .

अब आप यह सोच रहे है की ऐसा क्यों होता है ?

ऐसा प्रारब्ध आपको कर्म को भुगताने के लिए आप की बुद्धि के माध्यम से इन उपरोक्त प्रकार की परिस्तिथियों की रचना करता है .

अर्थात आप की बुद्धि इस प्रकार से काम करती है की प्रारब्ध कर्म ठीक से आप के मन और शरीर के माध्यम से भोगा जाए .

आप चाहकर भी इस बुद्धि की रचना से बच नहीं सकते है .

जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को यह ज्ञान प्राप्त होने लगता है की उपरोक्त प्रकार की बुद्धि से बचने का मतलब है की जैसे आप को सामने गिलास जमीन पर रखा हुआ दिखे और आप पूरी तरह इस गिलास को नज़रअंदाज कर दे .

और वही आप खड़े खड़े यदि नज़रअंदाज नहीं कर पा रहे है तो तुरंत वहाँ से कही दूर चले जाए .

अब आप वही खड़े रहकर इस गिलास को नज़रअंदाज कर पायेंगे या नहीं या फिर आप को दूर जाना ही पड़ेगा तो यह आप की आत्मा की जाग्रति पर निर्भर करता है .

अर्थात जैसे आप को पता हो की एक वीतरागी संत के सामने यदि कोई हत्या हो रही हो तो वह ऐसे कर्म से विचलित हुए बिना वही खड़ा खड़ा इस दृश्य को देख सकता है .

और यदि इस वीतरागी संत की जगह कोई हमारा  साथी हो तो या तो डरकर भाग जायेगा . या फिर पुलिस को सुचना देगा या फिर कुछ बचाव का काम करेगा .

 

यह हर इंसान की आत्मा की शक्ति पर निर्भर करता है .

 

अर्थात आपको कर्म को भुगताने के लिए ईश्वर की प्रकृति जो परिस्तिथि की रचना करती है वह इस प्रकार से करती है की आप को यह लगता है की ऐसी स्तिथि जानबूझकर नहीं रची गयी है . अर्थात आप को यही स्तिथि सच्ची दिखाई देती है .

जैसे एक कहावत आप ने भी सुनी होगी की जब गीदड़ की मौत आती है तो वह खुद गाँव की तरफ जाता है .

यह हम सभी के साथ कई बार हुआ है की जब हमारे प्रारब्ध को हमारी ठुकाई करानी होतो इसी प्रारब्ध कर्म के प्रभाव के कारण हम हमारी जीभ से अपशब्द बोलना शुरू कर देते है .

 

आपको कर्म को भुगताने के लिए कैसे प्रारब्ध आप की बुद्धि को घुमा देता है ?

अब इसे मै आप को विज्ञान के आधार पर समझाता हूँ :

हमारा मन एक ऊर्जा है . और इस ऊर्जा मै भी अनंत प्रकार की उर्जाये समाहित है . और इसी मन में वह ज्ञान है जिससे यह मन हमारे को इस दिखाई देने वाले शरीर का निर्माण करता है .

इसलिए हमारा मन इन्द्रियों के माध्यम से जो भी कर्म करता है उसे अवचेतन मन के रूप में जमा करता रहता है .

और यही संचित कर्म जब संख्या में लगातार बढ़ते जाते है तो फिर घनीभूत होकर शरीर का रूप धारण कर लेते है . जिसे वैज्ञानिक आइंस्टीन ने भी सिद्ध करके बताया था की कैसे ऊर्जा को द्रव्यमान में बदला जा सकता है .

मतलब जब हमारा मन किसी एक ही विचार को बार बार दोहराता है तो वही विचार उसमे निहित भावना के अनुसार दृश्य या अदृश्य रूप में घनीभूत होने लगता है .

जैसे वह विचार यदि किसी को अपशब्द बोलने का है और हमने इस विचार को बार बार दोहराया है तो फिर यह विचार हमारी जीभ का रूप धारण कर लेगा .

अर्थात अब वह अपशब्द बोलने वाला विचार ही हमारी जीभ के रूप में साकार हो चूका है .

और यह विचार किसके लिए बोला गया है उस वस्तु या कोई भी जीव का रूप ही हमारी आँखे बन चुकी है .

अब जैसे ही इस विचार से सम्बंधित ऊर्जा आप की आँखों से टकरायेगी तो आप की जीभ अपशब्द बोलना शुरू कर देगी .

अर्थात भीतर से प्रारब्ध ऊर्जा जीभ और आँखों के माध्यम से इस सामने दिखाई दे रही वस्तु या जीव पर प्रवाहित होगी .

और आप को तो पता ही है की न्यूटन के नियम के अनुसार क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है . इसलिए जैसे ही आप की जीभ अपशब्द बोलने लगती है तो ब्रह्माण्ड आप को अपशब्द ही वापस लौटाता है .

इसीलिए तो हम सब यह कहते है की प्यार बांटोगे तो बदले में प्यार ही मिलेगा . और यदि नफरत बांटोगे तो बदले में नफरत ही मिलेगी .

पर यदि हमारी जीभ और आँखे ही नफरत के विचारों से निर्मित हुयी है तो फिर हम बिना स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास के कैसे प्यार बाँट सकते है .

जब हम स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो हमारी जीभ और आँखे प्रेम तत्व में रूपांतरित होने लगती है .

अर्थात स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से मन और शरीर की ऊर्जा का रूप बदलने लगता है . पहले मन की ऊर्जा बदलने लगती है और फिर आप तो समझते ही है की जैसा मन वैसा ही तन .

और जैसा अन्न वैसा मन .

यहां अन्न का अर्थ है

  • हमारी भावनाएँ
  • हमारी संगत
  • हमारी सोच
  • हमारा खान पान
  • हमारी जीवनशैली  इत्यादि


इस प्रकार से जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो  आप के प्रारब्ध कर्मो की ऊर्जा प्रेम ऊर्जा में बदलने लगती है . जिससे आप के शरीर की इन्द्रियाँ भी निर्मल होने लगती है . और आप की इन इन्द्रियों में बहती हुयी प्रेम ऊर्जा के कारण आप को पूरा संसार प्रेमवत दिखाई देने लगता है .

अब आप के किसी बुरे कर्म को भुगतने का यदि समय आ गया है तो आप के सच्चे अभ्यास के कारण अब परिस्तिथि प्रेमवत हो जाएगी .

जिससे आप को सामने वाला इंसान आत्मा के रूप में दिखाई देने लगेगा . अर्थात जिसने भी आत्म दर्शन कर लिया है उस इंसान के लिए इस संसार में ना तो कोई शत्रु है और ना ही मित्र है . बल्कि वह उसका सच्चा प्रेमी साथी है .

अब आप ही बताइये की कोई अपने प्रेमी को प्रारब्ध भोग के समय अपशब्द कैसे बोल सकता है ?.

क्यों की स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से अब तो प्रारब्ध ही रूपांतरित हो चूका है .

इस प्रकार आज हमने प्रभु से उनके इस अनमोल ज्ञान को समझने का प्रयास किया है .

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धन्यवाद जी . मंगल हो जी .