इस लेख में आप को पूरे विज्ञानं के आधार पर आप के खुद के स्वरुप का दर्शन कराया जा रहा है. आप इसे बार बार पढ़कर गहराई से समझने का प्रयास करे .
ऐसे करे खुद के स्वरुप का दर्शन
ऐसे करे खुद के स्वरुप का दर्शन
मेरे दोस्त आप अभी चाहे कैसी भी परिस्तिथि से गुजर रहे हो , मेरा यह लेख यदि आप समझने में कामयाब हो जाते हो तो फिर इसे पढ़ते पढ़ते ही आप को अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति होने लगेगी .
जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को धीरे धीरे यह अनुभूति होने लगती है की अभी आप की इन्द्रियाँ भूतकाल और भविष्यकाल में ही विचरण कर रही है .
अर्थात अभी आप की आँखे जो कुछ भी देख रही है वह आप के प्रारब्ध के अनुसार ही देख पा रही है . जैसे आप के किसी इंसान ने दो वर्ष पहले पैसे चुरा लिए थे . और अब वह इंसान एक ईमानदार व्यक्ति बन चूका है .
पर प्रकृति के स्वचालित नियम के कारण इन दो वर्षो में आप का उससे कोई मिलान नहीं हुआ है .
अब जैसे ही आप इस इंसान को आज कही बाजार में देखते है तो आप का मन आप से तुरंत यह कहेगा की अरे देखो यह चोर आज मुझे दो साल बाद दिखा है .
मतलब आप ने दो साल से इस आत्मा को चोर
के रूप में अपने मन के माध्यम से बार बार पोषित किया है .
अर्थात जब भी आप कोई दृश्य देखते है या कोई आवाज सुनते है या किसी भी प्रकार के स्पर्श की अनुभूति करते है तो आप के साथ उस समय दो बाते घटित होती है .
पहली घटना चेतन मन के अनुसार होती है और दूसरी घटना अवचेतन मन के आधार पर होती है .
जो घटना चेतन मन के आधार पर होती है उसमे सामने वाला इंसान आप को एक सामान्य इंसान के रूप में ही दिखता है .
अर्थात आपका चेतन मन एक शुद्ध आत्मा ही देखता है .
क्यों की खुद चैतन्य है इसलिए दिखाई दी
जाने वाली हर वस्तु चैतन्य महसूस होती है .
इस घटना में आप के ह्रदय में ऐसी कोई सुख और दुःख पहुंचाने वाली भावनाएँ जन्म नहीं लेती है . क्यों की चेतन मन सीधा आत्मा से ज्ञान रुपी शक्ति प्राप्त कर रहा होता है . जिसमे निर्मलता के भाव छिपे होते है .
अर्थात आप का चेतन मन परमात्मा का शुद्ध प्रकाश होता है . इसलिए इसमें यह ज्ञान होता है की हम सभी आत्मायें है . और हम सभी एक ही परमात्मा की संतान है .
पर जो आप के साथ दूसरी घटना घटित होती है , वह अवचेतन मन के कारण घटती है .
अवचेतन मन आप की आत्मा में संचित यादे है .
अर्थात चेतन मन ही परमात्मा की इच्छा के कारण और परमात्मा के अनुरूप अवचेतन मन में रूपांतरित होता जाता है .
इसे मै आप को निम्न उदाहरणों से समझाता
हूँ :
जैसे आप किसी अँधेरे कमरे में एक बिल्ली को बैठी हुई देखने की कल्पना के माध्यम से कोशिश करना .
तो कुछ ही देर में आपको बिल्ली की आकृति दिखाई देने लगेगी .
दूसरा
उदाहरण -
जब आप किसी को बहुत ही सच्चे ह्रदय से बार बार याद करते है तो वह वस्तु या इंसान आप के सामने आ जाता है .
यहां सच्चे ह्रदय का अर्थ है आत्मा की पुकार .
मतलब परमात्मा केवल हमारी आत्मा की पुकार ही सुनते है . और जो कुछ भी हम देखना या प्राप्त करना चाहते है वह हमे शत प्रतिशत मिल जाता है .
आप ने भी कई बार
बोलचाल में सुना होगा की :
'आप मन से याद करो हम जरूर आयेंगे'
'आप आत्मा से याद करो मै जरूर आउंगी'
'आप एक बार दिल से प्रभु को याद तो करो , वे हमारी पुकार अवश्य सुनेंगे' .
यहां चेतन मन हमारी आत्मा का प्रकाश है . और जब यही प्रकाश बार बार किसी भी प्रकार की इच्छा का आव्हान करता है तो यही प्रकाश संघनित होकर दृश्य रूप ले लेता है .
मतलब वास्तविक रूप में हम सभी प्रकाश के ही सघन रूप है .
यह
पूरा संसार परमात्मा के प्रकाश से जगमगा रहा है .
यही जगमगाहट अवचेतन मन कहलाती है . इसे ही प्रारब्ध कहा जाता है .
और इसी दृश्य प्रकाश में हमारा चेतन मन लगभग ९५ प्रतिशत दबा हुआ है . अर्थात हमारी आत्मा लगभग ९५ प्रतिशत अवचेतन मन से ढकी हुयी है .
इसीलिए आज हमे मनुष्य योनि मिली हुयी होने के बावजूद हम पशुओं की तरह व्यवहार कर रहे है . यह बात मै सभी आत्माओं के लिए नहीं कह रहा हूँ .
अर्थात यह आप का शरीर और पूरा संसार आप के अवचेतन मन के कारण ही आप को दिखाई दे रहा है .
आप का चेतन मन आप के प्रारब्ध के कारण
लगभग ९५ प्रतिशत दबा हुआ है .
इसी दबाव के कारण आप हमेशा जल्दबाजी या बहुत आलसी स्तिथि में रहते है .
मतलब इसी दबाव के कारण आप की आत्मा खुद को स्वतंत्र महसूस नहीं करती है . वास्तविक रूप में तो आत्मा पूर्ण रूप से स्वतन्त्र ही है . पर परमात्मा की इच्छा ने इसे संसार रुपी माया नाम के पिंजरे में कैद कर रखा है . और अपनी मर्जी से नचा रहे है .
इसे मै आप को और गहराई से समझा रहा हूँ
:
आप का अवचेतन मन दृश्य क्षेत्र है और चेतन मन अदृश्य क्षेत्र है .
अब आप मुझे यह बताइये की आप सामने दिख रहे गिलास पर विश्वास करोगे या कमरे के अंदर रखे गिलास पर .
आप हमेशा जो सामने गिलास दिखता है उसी पर भरोसा करते हो .
यदि मै
आप से कहू की आप मुझे यह लिखकर दे की अभी आप के पास घर में कुल कितने गिलास है ?.
तो आप का अवचेतन मन तुरंत कहेगा की एक गिलास तो यह आप के सामने ही रखा है और फिर यही अवचेतन मन कहेगा की किचन में कितने पड़े है इसे तो आप को गिनना पड़ेगा .
पर इसी बीच आप का चेतन मन कहेगा की भाई एक बार बिना किचन में देखे याद तो कर की तूने अब तक कहा कहा से गिलास खरीदे है .
इस पर
तुरंत आप का अवचेतन मन जवाब देगा की , नहीं तुम याद नहीं सकते
हो . क्यों की कई बार आप की पत्नी ने भी तो गिलास खरीदे है . और फिर यही अवचेतन मन
आगे कहेगा की
तुम क्या क्या इन
एक एक छोटी छोटी चीजों को ही गिनते रहोगे
या कुछ नया काम
भी करोगे
तुम्हे अभी बहुत
आगे जाना है
इस प्रकार से आप की आत्मा के ऊपर अवचेतन मन के भारी डोज , चेतन मन के एक जाग्रति डोज पर भारी पड़ते है .
और आप की आत्मा अवचेतन मन का कहना मान लेती है और आप खुद पर भरोसा करने के आये इस अवसर को खो देते है .
ऐसा क्यों हुआ की चेतन मन की आवाज दब
गयी ?
क्यों की आप के ही इस चेतन मन ने इस विचार को बार बार दोहराया है की तुम्हे बहुत आगे जाना है , छोटी छोटी बातों पर ध्यान नहीं देना है .
इसलिए आप ने खुद ने ही अपने मन का स्वभाव ऐसा बना लिया है की यह बार बार का दोहराव ठोस रूप ले लिया . अर्थात इस का वजन बढ़ गया है .
मतलब अवचेतन मन का वजन चेतन मन से ज्यादा होता है . और जिसका वजन ज्यादा होता है उसकी बात में दम होता है .
पर वह
बात अलग है की यह दम हमारा दम निकाल रहा है या हमे स्वतंत्र करने के
लिए दम लगा रहा है .
इस प्रकार से जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को यह अनुभूति होती है की यदि आप चेतन मन के साथ जीने का अभ्यास करते है तो फिर धीरे धीरे सच्ची स्वतंत्रता की अनुभूति करने लगते है .
मतलब अभी आप
स्वतंत्र है यदि आप इस क्षण को
जाग्रत होकर देख
रहे है
जी रहे है
समझ रहे है
खुश हो रहे है
तो आप पायेंगे की सबकुछ अपने आप हो रहा है . आप ऐसा अभ्यास करके कर्मबन्धन से मुक्त होते है . आप के सभी कर्म परमात्मा खुद पर ले लेते है . क्यों की आप खुद परमात्मा के अधीन है .
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धन्यवाद
जी . मंगल हो जी .
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