6 दिसंबर: राष्ट्रीय गौरव दिवस
07 Dec, 2025
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धर्मो रक्षति रक्षितः
6 दिसंबर 1992 का दिन भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। यह वह दिन था जब अयोध्या में बाबरी ढांचे का विध्वंस हुआ और राम मंदिर आंदोलन ने एक नया रूप लिया। लाखों हिंदुओं के लिए यह दिन उनके आस्था केंद्र की मुक्ति का प्रतीक बन गया। यह लेख उस 500 वर्षीय संघर्ष की पूरी कहानी बयान करता है जिसमें अनगिनत हिंदू कारसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 500 वर्षों का संघर्ष
मुगल काल की शुरुआत (1528)
26 मार्च 1528: मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में एक विवादित संरचना का निर्माण करवाया। हिंदू मान्यता के अनुसार, यह स्थल भगवान राम की जन्मभूमि था और यहां पहले से एक भव्य मंदिर विद्यमान था।
प्रारंभिक प्रतिरोध (1528-1853)
- 1528-1707: स्थानीय हिंदू समुदाय ने लगातार इस स्थल पर अपना अधिकार बनाए रखने की कोशिश की
- मुगल शासन के दौरान कई बार छोटे-मोटे संघर्ष हुए
- हिंदू साधु-संत निरंतर इस स्थल की पूजा करते रहे
पहला दर्ज सांप्रदायिक संघर्ष (1853)
1853: अयोध्या में पहला बड़ा सांप्रदायिक दंगा दर्ज किया गया जो इस विवादित स्थल को लेकर हुआ। इसमें कई हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग मारे गए।
ब्रिटिश काल (1857-1947)
1859: ब्रिटिश प्रशासन ने एक बाड़ लगाकर स्थल को दो भागों में विभाजित किया:
- बाहरी प्रांगण में हिंदू पूजा करते थे
- आंतरिक भाग में मुस्लिम नमाज पढ़ते थे
1885: महंत रघुबर दास ने फैजाबाद जिला अदालत में चबूतरा बनाने की अनुमति के लिए मुकदमा दायर किया - यह पहला कानूनी मामला था।
स्वतंत्रता के बाद: नया दौर (1947-1980)
मूर्ति स्थापना की घटना (1949)
22-23 दिसंबर 1949 की रात: विवादित ढांचे के गर्भगृह में रामलला की मूर्तियां प्रकट हुईं। हिंदुओं ने इसे चमत्कार बताया। सरकार ने तुरंत स्थल को विवादित घोषित कर ताले लगा दिए।
1950: गोपाल सिंह विशारद ने सिविल जज की अदालत में मुकदमा दायर किया कि रामलला की पूजा की अनुमति दी जाए।
शांत दौर (1950-1984)
इस अवधि में स्थल पर ताले लगे रहे लेकिन हिंदू समुदाय का संघर्ष जारी रहा। विभिन्न साधु-संतों और धार्मिक नेताओं ने इस मुद्दे को जीवित रखा।
आंदोलन का पुनर्जागरण (1984-1989)
विश्व हिंदू परिषद की भूमिका
1984: विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने "राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति" का गठन किया। इसके प्रमुख संयोजक थे:
- महंत अवैद्यनाथ
- आचार्य गिरिराज किशोर
- साध्वी ऋतंभरा
1986: एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब:
- 1 फरवरी 1986: फैजाबाद जिला न्यायाधीश के.एम. पांडे ने विवादित स्थल के ताले खोलने का आदेश दिया
- पहली बार 37 वर्षों बाद हिंदुओं को पूजा की अनुमति मिली
शिलान्यास और आंदोलन की गति
9 नवंबर 1989: तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार में विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर का शिलान्यास करने की अनुमति मिली। शिलान्यास कार्यक्रम में लाखों श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
आंदोलन का चरम: 1990-1992
लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा (1990)
25 सितंबर 1990: भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या के लिए "राम रथ यात्रा" शुरू की। यह यात्रा:
- 10,000 किलोमीटर से अधिक की थी
- सैकड़ों शहरों और कस्बों से गुजरी
- लाखों लोगों ने इसमें भाग लिया
23 अक्टूबर 1990: बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार करवा दिया।
प्रथम कारसेवा और 2 नवंबर 1990 का नरसंहार
30 अक्टूबर - 2 नवंबर 1990: पहला बड़ा कारसेवा कार्यक्रम आयोजित हुआ। हजारों कारसेवक अयोध्या पहुंचे।
2 नवंबर 1990 - काला दिवस:
- उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव सरकार ने कारसेवकों पर गोलियां चलवाईं
- आधिकारिक आंकड़े: 16 लोग मारे गए
- अनाधिकारिक स्रोतों के अनुसार: 50-100 से अधिक कारसेवक शहीद हुए
- सरयू नदी का पानी लाल हो गया था
- घायल कारसेवकों की संख्या सैकड़ों में थी
शहीद कारसेवक: कोठारी बंधुओं (रामकोठारी, शरदकोठारी) सहित कई निहत्थे श्रद्धालुओं को गोलियों से भून दिया गया।
1991-1992: अंतिम तैयारी
जुलाई 1991: कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया।
1992: विश्व हिंदू परिषद ने घोषणा की कि 6 दिसंबर 1992 को विवादित स्थल पर "कारसेवा" होगी।
6 दिसंबर 1992: ऐतिहासिक दिन
घटनाक्रम का विस्तृत विवरण
प्रातः काल (5:00 AM - 10:00 AM):
- पूरे देश से लाखों कारसेवक अयोध्या पहुंच चुके थे
- अनुमानित संख्या: 1.5 से 2 लाख श्रद्धालु
- सुबह से ही "जय श्री राम" के नारों से आकाश गूंज रहा था
- कल्याण सिंह की सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था तैनात की थी
मध्याह्न (12:00 PM - 3:00 PM):
- दोपहर करीब 12:00 बजे कारसेवकों ने सुरक्षा घेरा तोड़ दिया
- हजारों कारसेवक विवादित ढांचे पर चढ़ने लगे
- करसेवक अपने हाथों में कुदाल, फावड़े और भगवा झंडे लिए थे
- "राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे" के नारे गूंज रहे थे
निर्णायक घड़ी (3:00 PM - 5:00 PM):
- दोपहर 3:00 बजे: विवादित ढांचे के गुंबद पर पहला प्रहार
- कारसेवकों ने अपने हाथों से, कुदालों से, हथौड़ों से ढांचे को तोड़ना शुरू किया
- शाम 5:00 बजे तक: पूरा ढांचा जमींदोज हो गया
- केवल 6 घंटे में 464 वर्ष पुराना विवादित ढांचा समाप्त हो गया
प्रमुख नेता और संगठन
उपस्थित नेता:
- लालकृष्ण आडवाणी (भाजपा अध्यक्ष)
- मुरली मनोहर जोशी
- अशोक सिंघल (VHP नेता)
- उमा भारती
- साध्वी ऋतंभरा
- विनय कटियार
- कल्याण सिंह (मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश)
सक्रिय संगठन:
- विश्व हिंदू परिषद (VHP)
- बजरंग दल
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)
- शिव सेना
तत्काल परिणाम
राजनीतिक:
- कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त (6 दिसंबर 1992)
- राष्ट्रपति शासन लागू
- भाजपा शासित तीन अन्य राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश) की सरकारें बर्खास्त
सामाजिक:
- देशभर में सांप्रदायिक दंगे
- मुंबई में भीषण दंगे (दिसंबर 1992 - जनवरी 1993)
- कुल 2000 से अधिक लोगों की मृत्यु (हिंदू-मुस्लिम दोनों)
कोठारी बंधुओं और अन्य शहीदों को श्रद्धांजलि
2 नवंबर 1990 के शहीद
कोठारी बंधु: यह दो भाइयों की कहानी है जो अपनी आस्था के लिए शहीद हुए। रामकोठारी और शरदकोठारी राजस्थान से कारसेवा के लिए आए थे। मुलायम सिंह सरकार की पुलिस ने इन्हें गोली मार दी। उनका अपराध केवल यह था कि वे अपने आराध्य की जन्मभूमि पर जाना चाहते थे।
अन्य प्रमुख शहीद:
- राम नरेश अग्रवाल (दिल्ली): 55 वर्षीय व्यापारी, परिवार छोड़कर कारसेवा के लिए आए
- कोटेश्वर राम (आंध्र प्रदेश): 28 वर्षीय युवक
- महावीर प्रसाद गुप्ता (बिहार): 60 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक
- राजेंद्र सिंह (उत्तर प्रदेश): 35 वर्षीय किसान
6 दिसंबर 1992 और बाद के शहीद
विध्वंस के दौरान और उसके बाद के दंगों में भी कई हिंदू कारसेवकों की जान गई:
- अयोध्या में पुलिस फायरिंग में लगभग 30-40 कारसेवक घायल हुए
- देशभर के दंगों में सैकड़ों हिंदू-मुस्लिम मारे गए
शहीदों का योगदान
इन शहीदों ने अपनी जान दी लेकिन:
- आंदोलन को और मजबूती मिली
- पूरे देश में राम मंदिर का मुद्दा प्रमुखता से उठा
- लाखों हिंदुओं में नई चेतना जागी
- अंततः राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ
मुलायम सिंह यादव सरकार की भूमिका
2 नवंबर 1990 की क्रूरता
मुलायम सिंह यादव (मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, 1989-1991):
सरकार का रुख:
- समाजवादी पार्टी और जनता दल की सरकार थी
- मुलायम सिंह ने स्पष्ट घोषणा की थी: "अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता"
- कहा था: "राम मंदिर हमारे रहते नहीं बन सकता"
2 नवंबर की कार्रवाई:
- PAC (प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी) को गोली चलाने का आदेश
- निहत्थे कारसेवकों पर अंधाधुंध गोलीबारी
- मृतकों की सही संख्या आज तक विवादित
- शवों को सरयू नदी में बहा दिया गया (आरोप)
राजनीतिक बयान: मुलायम ने बाद में कहा: "जो काम किया वह सही किया। हमें कोई पछतावा नहीं।"
प्रशासनिक मशीनरी
पुलिस अधिकारी:
- डीजीपी राम प्रकाश गुप्ता
- एडिशनल डीजीपी एस.पी. मौर्य
- स्थानीय एसपी अरुण कुमार
आरोप और जांच:
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया
- कई जांच आयोग बैठे
- लेकिन किसी को दंड नहीं मिला
न्यायिक संघर्ष: 1992-2019
लिब्रहान आयोग (1992-2009)
16 दिसंबर 1992: प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने न्यायमूर्ति एम.एस. लिब्रहान की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया।
रिपोर्ट (नवंबर 2009):
- 17 वर्षों में तैयार हुई
- 68 लोगों को दोषी ठहराया (भाजपा-संघ परिवार के नेता)
- लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह समेत कई नेताओं को जिम्मेदार बताया
विध्वंस मामले में आपराधिक मुकदमा
CBI केस (1992-2020):
- 1992: CBI ने मामला दर्ज किया
- 49 आरोपी: लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार आदि
- आरोप: धारा 153A, 153B, 505 (सांप्रदायिक दुश्मनी), धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र)
30 सितंबर 2020 का फैसला:
- विशेष CBI न्यायाधीश एस.के. यादव ने सभी 32 आरोपियों (कुछ की मृत्यु हो चुकी थी) को बरी कर दिया
- कहा: "विध्वंस पूर्व-नियोजित नहीं था, यह अचानक हुआ"
- कहा: "आरोपियों की भूमिका साबित नहीं हुई"
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला (2010)
30 सितंबर 2010: तीन न्यायाधीशों की पीठ (न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल, न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया:
फैसले की मुख्य बातें:
- 2.77 एकड़ जमीन को तीन भागों में बांटा:
- 1/3 भाग: रामलला विराजमान (हिंदू पक्ष)
- 1/3 भाग: निर्मोही अखाड़ा
- 1/3 भाग: सुन्नी वक्फ बोर्ड (मुस्लिम पक्ष)
महत्वपूर्ण निष्कर्ष:
- न्यायालय ने माना कि विवादित स्थल पर मंदिर के अवशेष मिले
- ASI रिपोर्ट को स्वीकार किया
- कहा कि यह स्थल हिंदुओं के लिए आस्था का केंद्र है
सर्वोच्च न्यायालय: अंतिम फैसला (2019)
अगस्त 2017 - अगस्त 2019: सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई
- पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ
- मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर, न्यायमूर्ति एस.ए. बोबडे
सुनवाई का विवरण:
- 40 दिनों तक दैनिक सुनवाई
- तीन पक्ष: हिंदू पक्ष, मुस्लिम पक्ष, निर्मोही अखाड़ा
- ASI रिपोर्ट, ऐतिहासिक साक्ष्य, धार्मिक दस्तावेज प्रस्तुत
9 नवंबर 2019 - ऐतिहासिक फैसला: 5:0 के बहुमत से सर्वसम्मति से फैसला:
फैसले की मुख्य बातें:
- संपूर्ण 2.77 एकड़ जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए
- केंद्र सरकार "श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट" बनाए
- सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में वैकल्पिक 5 एकड़ जमीन मस्जिद निर्माण के लिए
- निर्मोही अखाड़ा को ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व
न्यायालय के महत्वपूर्ण निष्कर्ष:
- "बाबरी मस्जिद का विध्वंस कानून का उल्लंघन था"
- "ASI रिपोर्ट से साबित होता है कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष थे"
- "हिंदुओं की आस्था इस स्थल से जुड़ी है"
- "मुस्लिम पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि मस्जिद का विशेष निर्माण हुआ"
राम मंदिर निर्माण: 2019-2025
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट
5 फरवरी 2020: केंद्र सरकार ने ट्रस्ट का गठन किया
ट्रस्ट के सदस्य:
- अध्यक्ष: महंत नृत्य गोपाल दास
- महासचिव: चंपत राय
- सदस्य: स्वामी गोविंद देव गिरि, विमलेंद्र मोहन प्रतीक मिश्रा, कमल नयन दास आदि
भूमि पूजन: 5 अगस्त 2020
ऐतिहासिक दिन:
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूमि पूजन किया
- RSS प्रमुख मोहन भागवत उपस्थित
- COVID-19 के कारण सीमित उपस्थिति
- पूरे देश में उत्सव का माहौल
- हजारों वर्षों की प्रतीक्षा का अंत
भूमि पूजन समारोह:
- वैदिक रीति-रिवाजों से संपन्न
- 40 किलो का चांदी का ईंट रखा गया
- प्रधानमंत्री ने रामलला की पूजा की
मंदिर निर्माण का विवरण
वास्तुकार और योजना:
- मुख्य वास्तुकार: चंद्रकांत सोमपुरा (अहमदाबाद)
- सोमपुरा परिवार की तीन पीढ़ियों ने डिजाइन पर काम किया
- शैली: नागर शैली (उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य)
मंदिर की विशेषताएं:
- ऊंचाई: 161 फीट (49 मीटर)
- लंबाई: 380 फीट
- चौड़ाई: 250 फीट
- तल: 3 मंजिल
- स्तंभ: 392 खंभे
- कक्ष: 5 मंडप (नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना मंडप, कीर्तन मंडप)
- शिखर: बंगाल शैली का भव्य शिखर
निर्माण सामग्री:
- पत्थर: राजस्थान के बंसी-पहाड़पुर से गुलाबी बलुआ पत्थर
- लगभग 2 लाख टन पत्थर का उपयोग
- कोई स्टील या लोहा नहीं (पूर्णतः पत्थर का निर्माण)
- परंपरागत चूना-सुरखी का प्रयोग
निर्माण तकनीक:
- भूकंप रोधी डिजाइन
- 2100 पत्थरों में नक्काशी
- Interlocking system (बिना सीमेंट-लोहे के)
धर्मो रक्षति रक्षितः
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