हर शायरी, हर मिसरा, उसी की कोई बात होती है। जो कह नहीं पाया, वो अब काग़ज़ कह देता है। और शायद, मेरा टूटा दिल अब लफ़्ज़ों में मुकम्मल हो रहा है।
वो जो मेरी कहानी बनकर भी अधूरी रह गई...
हम पहली बार एक कॉफ़ी शॉप में मिले थे।
वो सामने वाली टेबल पर बैठी थी — एक किताब में खोई हुई, बालों की एक लट बार-बार उसके चेहरे पर आ रही थी, जिसे वो बड़े प्यार से पीछे कर रही थी। मैं देख रहा था... बिन बात के, बिन वजह के।
और फिर, न जाने कैसे हमारी नज़रें टकराईं — एक सेकंड का वो लम्हा जैसे सदियों तक दिल में कैद हो गया।
कुछ दिन बाद, उसी शहर की सड़कों पर हम फिर टकराए। इस बार संयोग नहीं, इशारा था। उसने मुस्कुरा कर "हाय" कहा और मैं वहीं ठहर गया — अपनी ही धड़कनों को समझते हुए।
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं, मुलाक़ातें होने लगीं।
वो खुलकर हँसती थी, और मैं उसकी हँसी में खुद को ढूंढता था। उसे बारिश पसंद थी, मुझे उसके भीगे बाल।
वो बातें करते-करते चुप हो जाती, और मैं उसकी खामोशियों को पढ़ने लगा था।
मैंने कभी उससे इज़हार नहीं किया... और शायद, उसे कभी ज़रूरत भी नहीं लगी।
वो सब समझती थी — मेरी आँखें, मेरे इंतज़ार, मेरी खामोश दुआएँ।
लेकिन एक दिन वो अचानक बदल गई।
उसकी आँखों में अब सवाल नहीं थे, जवाब थे — सख़्त और साफ़।
"मुझे जाना होगा," उसने कहा।
"कहाँ?" मैंने पूछा।
"कहीं जहाँ तुम्हारे साथ मेरी जगह नहीं बन सकती।"
मैं कुछ कह नहीं पाया, बस खड़ा रहा... जैसे किसी ने रूह निकाल ली हो, आवाज़ छीन ली हो।
वो चली गई — बिना किसी शिकवा, बिना अलविदा... बस एक अधूरी मुस्कान छोड़ गई।
अब जब उसकी यादें आती हैं, तो मैं चुप नहीं रहता।
अब मैं लिखता हूँ...
हर शायरी, हर मिसरा, उसी की कोई बात होती है।
जो कह नहीं पाया, वो अब काग़ज़ कह देता है।
और शायद, मेरा टूटा दिल अब लफ़्ज़ों में मुकम्मल हो रहा है।
क्योंकि प्यार भले ही ना रहा,
पर मोहब्बत अब भी ज़िंदा है... मेरी शायरियों में।
Comments (0)
Login to comment.
Share this post: