उस शाम... जब उसकी उँगलियों ने मेरा नाम छू लिया

सूरज थक कर छिप रहा था और उसकी सुनहरी किरणें मेरी खिड़की के पर्दे से सरकती हुई उस पर गिर रही थीं। वो वहीं खड़ा था—कंधे टिकाए, होंठों पर वही पुराना-सा मुस्कुराता रहस्य...

वो शाम कोई आम नहीं थी। सूरज थक कर छिप रहा था और उसकी सुनहरी किरणें मेरी खिड़की के पर्दे से सरकती हुई उस पर गिर रही थीं। वो वहीं खड़ा था—कंधे टिकाए, होंठों पर वही पुराना-सा मुस्कुराता रहस्य... मैंने नज़रें फेर लीं, पर दिल नहीं फेर सका।

1. उसकी नज़रें... जैसे कोई धीमी चिंगारी वो कुछ नहीं बोलता था, पर उसकी नज़रों में एक कहानी थी—धीरे-धीरे सुलगती हुई, जैसे बारिश से पहले की गर्म हवा। हर बार जब उसकी पलकें उठतीं, लगता जैसे वो मेरी परतें पढ़ रहा हो, एक-एक कर खोलता हुआ मुझे… मैंने लब भींचे, पर धड़कनों ने मेरी बेबसी बयान कर दी।

2. छुअन… जो शब्दों से कहीं आगे थी उसकी उंगलियाँ मेरी हथेली के पास आईं, बिना छुए भी मुझे छू गईं। एक सिहरन उठी—बिलकुल वैसी, जैसी ठंडी हवा गर्म चाय के प्याले को छूकर लौटती है। वो कुछ पूछ नहीं रहा था, लेकिन जवाब चाहता था। और मैं... मैं चाहती थी कि वो मेरे जवाबों में खुद को ढूंढे।

3. वो दूरी... जो कशिश बन गई हमारे बीच कुछ कदमों का फासला था, पर उन कदमों में एक सदी सिमटी हुई लगती थी। मैंने चाहा कि वो पास आए... इतना पास कि मैं उसकी सांसों की गर्माहट में अपने नाम की गूंज सुन सकूँ। वो मुस्कुराया... जैसे वो जानता हो मैं क्या चाहती हूँ।

4. जब लम्हा ठहर गया उसने एक कदम आगे बढ़ाया। अब उसकी खुशबू मेरे बालों में उलझ रही थी। उसकी उंगलियाँ अब सचमुच मेरी हथेली पर थीं—नर्म, गर्म, जैसे हर एहसास का वादा लिए। उसकी आवाज़ आई, धीमे... कांपती हुई: "अगर तुम कहो... तो ये पल उम्र बन जाए?" मेरे होंठ हिले नहीं, पर मेरी आँखों ने हाँ कह दी।

5. वो पल… जब मैं उसकी हो गई उसने मेरी ठोड़ी को छूकर ऊपर उठाया। उसकी आँखों में देखा, तो खुद को देखा—बिलकुल वैसी जैसी मैं हमेशा बनना चाहती थी—खुली, नर्म, और चाही गई।

उसका लब मेरे ललाट से मिला। इतना धीमा कि खुद वक़्त भी झेंप गया। और फिर… कहाँ ख़त्म हुई मैं और कहाँ शुरू हुआ वो—ये आज तक तय नहीं कर पाई। पर उस शाम, वो मेरी साँसों में कुछ छोड़ गया था… एक नाम... एक छुअन... एक कहानी... जिसे अब मैं हर रात अपनी रूह पर ओढ़कर सोती हूँ।