शैशव से शिखर तक – जीवन की कहानी एक लड़की की जुबानी...

– समर्पित हर उस नारी को, जो खुद में एक जीवन की कविता है।

बचपन की चहक
गुड़ियों का घर, सपनों का नगर,
माँ की गोद में था मेरा सागर।
कभी छुपन-छुपाई, कभी रंगों की बात,
कंचों में छुपे थे मेरे जज़्बात।

किशोर उम्र की पहली किरण
पहली बार जब खुद को जाना,
आईने में देखा, कुछ पहचाना।
सपनों ने पंख लगाए थे,
दिल में कई अरमान समाए थे।

यौवन की उड़ान
कॉलेज की गलियों से होकर गुज़री,
कभी हँसी, कभी आँसू से भरी।
दुनिया ने जब सवाल उठाए,
तो मैंने भी हौसले सजाए।

सपनों की दहलीज़ पर
कभी बेटी, कभी बहन बनी,
फिर जीवनसाथी की हमसफर बनी।
घर-आँगन में बसी मेरी मुस्कान,
पर सपनों ने भी माँगा सम्मान।

मातृत्व की ममता
नन्हीं उँगलियाँ थामी जब मैंने,
समझा खुदा ने मुझको छू लिया है।
नींदों को गिरवी रखकर भी,
हर लोरी में सुकून मिला है।

समझ की परिपक्वता
धीरे-धीरे बाल हुए चाँदी,
पर आँखों में अब भी हैं वो वादी।
ज़िंदगी ने जो सिखाया मुझे,
हर मोड़ पर अपनाया मैंने।

वृद्धावस्था की शांति
अब मैं दादी, नानी कहलाई,
कहानियों में फिर बचपन आई।
झुर्रियों में इतिहास सजा है,
जीवन मेरा एक कविता बना है।


निष्कर्ष
एक लड़की की ये पूरी कहानी,
हर रिश्ते में बसी उसकी जवानी।
बचपन से बुढ़ापे तक की उड़ान,
हर रंग में ढली, हर रूप में महान।

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– समर्पित हर उस नारी को, जो खुद में एक जीवन की कविता है।