हम में से ज्यादातर लोग हमारे शरीर से घृणा करते है . इसलिए इस घृणा के कारण हमारे शरीर के अस्तित्व को खतरा होने लगता है .
खुद के पेशाब को पीने का विज्ञानं और बास्या थूक से इलाज
खुद के पेशाब को पीने का विज्ञानं और बास्या
थूक से इलाज
दोस्तों आज आप का मित्र आप के मन में चलने वाले उन प्रश्नों का वास्तविक उत्तर देने जा रहा है जिसे आप स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से खुद अनुभव कर सकते है .
हम में से ज्यादातर लोग हमारे शरीर से
घृणा करते है . इसलिए इस घृणा के कारण हमारे शरीर के अस्तित्व को खतरा होने लगता
है .
इसलिए हमारे प्रभु ने हमारी भीतरी और बाहरी प्रकृति को इस प्रकार से रचा है की जब किसी के शरीर पर दाद हो जाता है तो हमारे घर के बड़े बुजुर्ग यह कहते है की इस दाद पर सुबह सुबह खुद का बास्या थूक लगाओ.
तो आप
को खुद को भी पता है की बास्या थूक लगाने से वह दाद धीरे धीरे ठीक हो जाता है .
और यदि हमारे इस प्रयोग से भी दाद ठीक नहीं होता है तो फिर हमे कहा जाता है की किसी अमुक इंसान के पास जाकर उसके मुँह से थूक लगवाओ.
जिसे
हम बोलचाल की भाषा में थूथकारना भी कहते है .
तो आखिर यह सब करके हम वास्तविक रूप में कर क्या रहे है ?
और मजे की बात यह है की सभी लोग इसी प्रकार से अपने रोगों को ठीक नहीं करते है .
यह इलाज केवल उन्ही को फायदा पहुंचाता है जो अपने शरीर से घृणा करते है .
क्यों की ऐसे इंसानो को बास्या थूक या
खुद का पेशाब पिने में शर्म आती है . उन्हें बहुत सूग आती है .
इसी प्रकार यदि किसी को आँखों से कम दीखता है या उसकी आँखों में किसी प्रकार की समस्या है तो ऐसे इंसान को चाहिए की वह सुबह सुबह अपना खुद का बास्या थूक काजल की तरह अपनी आँखों में रोज कुछ दिनों तक लगाए .
यदि वह पूरे विश्वास के साथ यह प्रयोग करता है तो यह शत प्रतिशत कारगर इलाज है . ऐसे व्यक्ति की आँखे फिर से धीरे धीरे ठीक होने लगती है .
ठीक
इसी प्रकार से अब हम खुद के पेशाब को पिने के पीछे के विज्ञान को समझते है .
खुद के पेशाब को पिने की क्रिया को प्राकृतिक चिकित्सा में शिवाम्बु पान भी कहते है .
अब कई लोग इस शिवाम्बु पान को यह कहते है की यह शब्द शिव से आया है . अर्थात उनका यह तर्क होता है की खुद शिव जी भी इसका पान करते है .
अब मै आप को इसका स्वरुप दर्शन क्रिया के आधार पर जवाब देता हूँ .
इसका
सही जवाब यह है की जितने मुँह उतनी बाते .
हमारा मुख्य लक्ष्य खुद को बीमारी से मुक्त करना होना चाहिए .
और मजे की बात यह है की यदि आप बीमार है तो फिर मै स्वस्थ कैसे रह सकता हूँ . क्यों की वास्तविक रूप में मेरे और आप के बीच में दूरी शून्य है .
इसीलिए जो ऊपर मेने थूथकारना वाले इलाज
के बारे में बताया है उसका सीधा सम्बन्ध यही है की हमे खुद के शरीर और किसी अन्य
के शरीर से घृणा नहीं करनी चाहिए .
अब आप इसका मतलब यह नहीं समझे की हम पवित्रता के मार्ग को छोड़ दे .
इसका सही मतलब यह होता है की हम कैसे हमारे शरीर और मन की कार्यप्रणाली को समझे .
अब यदि कोई इंसान दांतो और मसूड़ों के रोगों से परेशान है तो ऐसा इंसान यदि खुद के सुबह के पहले पेशाब को कुछ मात्रा में सेवन करता है तो उसके दांतो और मसूड़ों की समस्या दूर होने लगती है .
पर यदि ऐसा इंसान इस प्रकार से शिवाम्बु पान करता है पर दांतो और मसूड़ों को नुक्सान पहुंचाने वाले कर्म अभी भी लगातार करता है तो फिर आप खुद ही बताइये की इसमें शिवाम्बु पान का इलाज कैसे काम करेगा .
अर्थात
यदि हम हमारे शरीर को बीमारियों से मुक्त करने के लिए स्वरुप दर्शन क्रिया का
अभ्यास करते है और मेरे बताये अनुसार इलाज भी अपनाते है पर फिर भी वह इंसान अपनी
बुरी आदतों को नहीं छोड़ता है तो फिर इसमें भगवान् या चिकित्सक या इलाज या स्वरुप
दर्शन क्रिया क्या करेंगे .
मेरे कहने का अर्थ यह है की सबसे पहले आप को अपने दिमाग से इस प्रकार के विचारो को हटाना चाहिए जैसे :
- दांतो का रंग सफ़ेद होना चाहिए
- पेशाब एक बार में इतना आना चाहिए
- शरीर पर दाद अच्छे नहीं लगते है
- मुँह से बदबू नहीं आनी चाहिए
ऐसे और भी अनेक
विचार हमारे मन में हर समय आते है .
और आप इन नकारात्मक विचारों से मुक्ति केवल स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से ही पा सकते है .
अब प्रश्न यह आता है की यदि आप किसी एलोपेथिक चिकित्सक से बास्या थूक और खुद के पेशाब से होने वाले इलाजों की बात करते है तो आप को ऐसे चिकित्सक यह कहेंगे की आप ऐसे इलाज करके खुद को खतरे में डाल रहे है .
ऐसे चिकित्सक आप से कहेंगे की ऐसे
इलाजों से आप को कई प्रकार के संक्रमणों का सामना करना पड़ सकता है .
जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को इस प्रकार के प्रश्नों का वास्तविक उत्तर मिलने लगता है .
जैसे यदि कोई
इंसान सॉफ्टवेयर इंजीनियर है तो आप को वह अपने क्षेत्र और अनुभव से सम्बंधित
जानकारी ही सही से दे सकता है .
इसलिए एक एलोपेथिक चिकित्सक लगभग १० से १५ वर्ष तक यही पढ़ाई करता है की किसी भी बीमारी का इलाज उसकी शिक्षा में जिस रूप में बताया गया है उसी प्रकार से होता है .
इसलिए ऐसे चिकित्सक यदि बास्या थूक और शिवाम्बु पान को गलत बताते है तो इसमें इन चिकित्सकों की गलती नहीं है .
ये एलोपेथिक चिकित्सक अपनी जगह शत
प्रतिशत सही है .
अर्थात जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो आप को पता चलने लगता है की हमे किसी का भी विरोध नहीं करना है .
मतलब सभी लोग बास्या थूक से ठीक नहीं हो सकते और सभी लोग एलोपेथिक चिकित्सा से ठीक नहीं हो सकते है .
यह आप के ऊपर निर्भर करता है की आप का विश्वास किस प्रकार के इलाज में है .
जैसे यदि आप का विश्वास हमेशा घृणा करने
में ही है तो फिर आप चाहे कैसा भी इलाज करलो , आप
को शत प्रतिशत फायदा नहीं मिलेगा .
ऐसा क्यों ?
क्यों की कण कण में केवल परमात्मा का ही अस्तित्व है . इसलिए आप यह नहीं कर सकते है की किसी एक चीज को स्वीकार करले और दूसरी को अस्वीकार .
अर्थात आप को खुद को और इस पूरे संसार को जैसा यह है वैसा ही स्वीकार करना बहुत अनिवार्य है यदि आप हर प्रकार की बीमारी से हमेशा के लिए मुक्त होना चाहते है .
मतलब आप का प्रभु से जुड़ने का वास्तविक
अर्थ यह होता है की अब आप कण कण में परमात्मा को स्वीकार कर रहे है .
इसलिए यदि आप एक एलोपेथिक चिकित्सक है तो फिर आप की मान्यता यह होनी चाहिए की बास्या थूक और शिवाम्बु पान चिकित्सा भी शत प्रतिशत सही है और एलोपेथिक चिकित्सा पद्द्ति भी शत प्रतिशत सही है .
पर किसके लिए क्या सही है यह व्यक्ति की खुद की समझ पर निर्भर करता है . उसकी क्या परिस्तिथि है . अर्थात यह सब हमारे प्रभु की इच्छा से होता है .
मतलब हर प्रकार
का इलाज हमे लगातार शिक्षित कर रहा है .
इसलिए मेरे मित्रों यदि आप को किसी भी बीमारी के लिए शत प्रतिशत सही चिकित्सा पद्द्ति का निर्णय लेना है तो सबसे पहले आप आज ही से स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास शुरू करे .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
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