सालों बाद दीपा मायके लौटी थी। वही पुराना पटना का मोहल्ला — तंग गलियां, सटी छतें, और कुछ अधूरी यादें। शाम का वक्त था, मां के साथ छत पर बैठी थी। पति संकल्प विदेश दौरे पर थे, हर साल की तरह।
छत से आई एक मुस्कान
छत से आई एक मुस्कान सालों बाद दीपा मायके लौटी थी। वही पुराना पटना का मोहल्ला — तंग गलियां, सटी छतें, और कुछ अधूरी यादें। शाम का वक्त था, मां के साथ छत पर बैठी थी। पति संकल्प विदेश दौरे पर थे, हर साल की तरह। छत से लगी पड़ोस की छत देख दीपा को किसी का चेहरा याद आया — अविनाश। वही जो स्कूल के दिनों में पास वाले मकान में रहता था, किरायेदार बनकर। दीपा ने मां से पूछा, तो जवाब मिला, “तुम्हारी शादी से पहले चला गया था।” चाय बनाते वक्त यादें आकर घेरने लगीं — छत पर परचियां, मुस्कुराहटें, और मेहंदी लगे हाथ। एक बार उसने चुपके से हाथ चूम लिए थे। दीपा भाग आई थी, मगर मन में कुछ ठहर गया था। शादी हुई, दीपा इंदौर आ गई। संकल्प अच्छे थे, पर व्यस्त — काम और क्रिकेट के बीच दीपा की मुस्कान कहीं खो सी गई थी। इस बार मायके में मोहिनी की मेहंदी में हाथ सजाए तो एक बार फिर छत पर चली गई। मेहंदी वाले हाथ हवा में लहराए — जैसे कोई पुराना दृश्य दोहराया जा रहा हो। आंटी ने देख कर कहा, “रंग खूब चढ़ा है, दूल्हा जरूर प्यार करता होगा।” दीपा मुस्कुरा दी, कुछ नहीं कहा। रात को लैपटॉप पर एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई — Avinash. दिल ने हल्का सा धड़क कर कहा — पुराना कोई दस्तक दे रहा है। मैसेज आया — “कैसी हो दीपा? तुम्हारी मुस्कुराहट अभी भी वहीं है न?” दीपा ने पढ़ा और देर तक स्क्रीन को देखती रही। कभी-कभी यादों की छतें भी बहुत पास आ जाती हैं।
Comments (0)
Login to comment.
Share this post: