मुकेश के अनुसार आप का मन पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है . अर्थात आप सर्वव्यापी है . मतलब जैसे आप दिल्ली में रहते है तो इसका वास्तविक अर्थ यह है की आप का भौतिक शरीर आप के मन के साथ दिल्ली में रहता है . परन्तु जिस मन का यह भौतिक शरीर आप रोज देख रहे है वह मन पूरे ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है .
आप के मन में अचानक विचार कैसे आ जाते है ?
आप के मन में अचानक विचार कैसे आ जाते है ?
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मुकेश के
अनुसार आप का मन पूरे
ब्रह्माण्ड में व्याप्त है . अर्थात आप सर्वव्यापी है . मतलब जैसे आप दिल्ली में
रहते है तो इसका वास्तविक अर्थ यह है की आप का भौतिक शरीर आप के मन के साथ
दिल्ली में रहता है . परन्तु जिस मन का यह भौतिक शरीर आप रोज देख रहे है वह मन
पूरे ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है . |
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मुकेश के अनुसार इसी मन को सर्वव्यापी मन , अचेतन मन , अवचेतन मन , चेतन मन इत्यादि से वर्गीकृत किया गया है . वास्तविक रूप में मन एक ही है . पर समझाने के लिए इसी मन को अलग अलग भागों में बाँट दिया गया है . आप का मन ही आप के
भावों के अनुसार आप के शरीर के रूप में निरंतर प्रकट हो रहा है . पर यह तो मन की
अनंत शक्तियों में से एक शक्ति का ही कमाल है . |
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अब यदि अमेरिका में कोई बढ़ी घटना घटती है तो यदि आप को कोई भी नहीं बताता है तो भी आप उस घटना से अवश्य प्रभावित होते है . अर्थात जापान में यदि किसी व्यक्ति के पेट में गैस बनती है तो उसका प्रभाव आप के मन पर भी पड़ता है . इसीलिए अचानक से आप के मन में कोई नया या पुराना विचार आ जाता है . मतलब पूरा संसार
विचारों का ही साकार रूप है . |
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विचार ही वस्तु के रूप में प्रकट हो जाते है . जैसे आप अपने आप को बहुत पतला व्यक्ति मानते है तो इसका मतलब यह है की अभी आप के मन में पतलेपन के विचार प्रकट हो रहे है . और ऐसा आप के खुद के शरीर को आप या तो पतला मानते है या कोई अन्य पतला व्यक्ति अपने शरीर को पतला मानता है . तो अन्य पतले व्यक्ति से भी विचार आप के मन में आने लगते है . इसलिए
ऐसी स्तिथि में अब आप ऐसे लोगों को आकर्षित करते है जो अब आप को पतला कहते है .
और फिर आप को बुरा लगता है . |
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अर्थात आप खुद ही मोटे या पतले लोगों को आकर्षित कर रहे है . मतलब वास्तविक रूप में आप के और इन लोगों के बीच दूरी शून्य है . इसलिए कई बार
आप यह कहते है की मेने तो मेरे मन में कभी सोचा ही नहीं की मै पतला हूँ . फिर भी
इस अमुक व्यक्ति ने मुझे पतला कैसे कह दिया . क्यों की वास्तविक रूप
में उस व्यक्ति के रूप में भी आप ही प्रकट हो रहे हो . इसलिए यदि आप अपने मन में
इन विचारों को पसंद या नापसंद करेंगे तो आप हमेशा चिंताग्रस्त रहेंगे . और हमेशा
किसी न किसी बीमारी से पीड़ित रहेंगे . |
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इसलिए ध्यान में पारंगत लोग यह कहते है की विचारों को केवल देखों. किसी भी विचार से जुड़ो मत . और कई लोग तो यह कहते है की आप विचार नहीं हो . जैसे यदि किसी देश में भूकंप
आता है तो आप भी उससे प्रभावित होते हो . पर जब आप
स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते हो तो आप को यह पता चलता है की ये भूकंप
क्यों आते है . |
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इसका कारण यह है की जब
आप एक दूसरे के विचारों को भला बुरा कहते हो , मै अलग तू अलग का भाव स्वीकार करते हो तो हमारा मन टूटने
लगता है . अर्थात यदि आप जापान में बैठे किसी व्यक्ति को अपने से अलग मानते हो
तो आप के मन में एक दरार पैदा होने लगती है . और प्रकृति इस दरार को तुरंत ठीक
करना शुरू कर देती है . |
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मतलब कभी आप प्रयोग करके देखना की किसी व्यक्ति को बहुत ज्यादा बुरा कहना . तो कुछ समय पश्चात आप के मन में एक पश्चाताप प्रकट होने लगता है . क्यों की आप ने उस व्यक्ति को खुद से अलग मानकर भला बुरा कहा है . पर वास्तविक सत्य यह है की वह व्यक्ति आप से इस कदर जुड़ा हुआ है जैसे गुलाब से खुशबू . इसीलिए तो जब आप किसी इंसान को अपना
दुश्मन मान लेते है तो जब आप ऐसे इंसान को कही भी देख लेते है या कोई इस इंसान
का नाम भी आप के सामने ले लेता है तो फिर आप के मन में एक अजीब सी बेचैनी छा
जाती है . |
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जबकि वास्तविक सत्य तो यह है की इस संसार में आप का दुश्मन कोई हो ही नहीं सकता है . क्यों की केवल परमात्मा का ही अस्तित्व है . बाकी सब माया है . और यह माया परमात्मा के इच्छा रुपी विचार से प्रकट होती है . |
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अर्थात
मै और आप प्रभु की इच्छा से ही प्रकट हो रहे है . और तब तक रहेंगे जबतक हमारे
प्रभु की इच्छा होगी . इसलिए आप के मन में
कैसा भी विचार आये , आप उसे प्रभु
की इच्छा समझे और पूर्ण रूप से स्वीकार करले . अर्थात यह स्वीकार करले की मेरे
मन में यह अहसास प्रभु का ही अहसास है . तो फिर आप के मन में कैसा भी विचार आये
आप हमेशा स्थिर रहेंगे . |
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
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